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  • विनाश के ठीक पहले की प्रेम कहानी है  विपिन-लिज़ा की “लव इन यूक्रेन”

    विनाश के ठीक पहले की प्रेम कहानी है विपिन-लिज़ा की “लव इन यूक्रेन”

    नोएडा: आज यूक्रेन की जो स्थिति है, गत् 20 फरवरी, 2022 के एक दिन पहले तक कुछ अलग था। तब का यूक्रेन अलग था, वहाँ के नज़ारे जुदा जुदा थे। वहाँ युद्ध की विभीषिका न था, विध्वंसक रॉकेट लॉन्चर के तांडव नहीं होते थे। हर गाँव शहर इंद्रधनुषी प्रेम प्रलाप, प्रेम कथाओं का साक्षी था। और इन्हीं शहरों गाँवों में परवान चढ़ी प्रेम कहानियों में एक थी आरव (विपिन कौशिक) व लिज़ा (लिज़ाबेटा) की यूनिक लवस्टोरी। यह प्रेमकहानी आपको दिखाई पड़ेगी कमल एंटरटेनमेंट प्रा० लि० एवं नेओल फिल्म्स कृत हिन्दी फिल्म “लव इन यूक्रेन”। फिल्माये गए अधिकांश सुरम्य स्थल (लोकेशंस) रूस द्वारा दागे गए रॉकेट बमों की भेंट चढ़ चुके हैं। इसलिए “लव इन यूक्रेन” देखना इसलिए भी उत्सुकता का विषय रहेगा कि बस कुछ माह पूर्व तक ऐसा था खूबसूरत यूक्रेन। फिल्म का म्यूजिक व ट्रेलर रिलीज किया जा चुका है और 27 मई, 2022 को थियेटर में प्रदर्शित होने जा रही है। नोएडा प्रेस क्लब में पत्रकारों से बात करते हुए फिल्म के लेखक – निर्देशक नितिन कुमार गुप्ता ने यह जानकारी दी।
    “लव इन यूक्रेन” का नायक आरव उच्च शिक्षा के लिए यूक्रेन गया हुआ है। वहीं पर एक यूक्रेनी युवती लिज़ा को तलवारबाजी का वह प्रशिक्षण भी देता है। इस तलवारबाजी की टंकार में दोनों एक दूसरे के कैसे हो जाते हैं, पता नहीं चल पाता ! ऊपर से तो कोई अड़चन नहीं दीखती, पर, यकायक सामने आ जाता है लिज़ा का भाई जो आरव मार डालना चाहता है क्योंकि लिज़ा की शादी का वचन एक माफिया परिवार के लड़के को बहुत पहले ही दिया जा चुका है। आगे का क्लाइमैक्स थियेटर में देख सकेंगे।


    “लव इन यूक्रेन” में इन्ट्रोड्यूस हो रहे हैं विपिन कौशिक। विपिन रंगमंच के एक परिपक्व अभिनेता रहे हैं और “लव इन यूक्रेन” से कर रहे हैं रजतपट पर पदार्पण। इनकी नायिका हैं यूक्रेनी तारिका लिज़ाबेटा। पूरी फिल्म यूक्रेन में ही फिल्मायी गई है। कहानी की पृष्ठभूमि यूक्रेन की है, सो, अधिकांश कलाकार भी यूक्रेन रूस के ही हैं। मुख्य सहयोगी कलाकार हैं – मिखाइल स्ट्रिगा, लोलिता ज़ुरालोव, रोमन बैट्रिन, रसलान सेफेरोव, कॉन्स्टेन्टिन शिर्येव, ब्लादिमीर डायेन्को, ओलिस ओमिट्रेंको, इर्मा बालन, सेर्जी सिनेसेनीय एवं एन.के.जी.। एसोसिएट प्रोड्यूसर विशाल ओमप्रकाश हैं। गीत शादाब अख्तर, संगीत नितिन कुमार गुप्ता, एक्शन यूरी डेरेवेंस्की व मिखाइल स्ट्रिगा तथा सिनेमैटोग्राफी अर्टेन कुपसियेंस्की एवं ऐंड्रे एरिमैंको के हैं।
    थियेटर प्रदर्शन तिथि – 27 मई, 2022.

  • उपराष्ट्रपति ने मीडिया संगठनों में विश्वसनीयता की जरूरत बताई और मीडिया को खबरों में विचार को मिश्रित नहीं करने का सुझाव दिया

    उपराष्ट्रपति ने मीडिया संगठनों में विश्वसनीयता की जरूरत बताई और मीडिया को खबरों में विचार को मिश्रित नहीं करने का सुझाव दिया

    नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु ने कहा है कि मीडिया को ’खबरों में विचारों को नहीं मिलाना चाहिए’ और तथ्यों को लोगों तक पहुंचाने में निष्पक्षता बनाए रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोग समाचार और प्रसारण मीडिया की सामग्री को विश्वसनीय मानते हैं और मीडिया संगठनों को उनकी उम्मीदों पर खरा उतरना चाहिए। उन्होंने कहा, ’पत्रकारिता को एक मिशन के रूप में लिया जाना चाहिए।’
    हैदराबाद में आज ’मुत्तनुरी कृष्णा राव सम्पदाकेयालु’ शीर्षक से संपादकीय संग्रह का विमोचन करते हुए, श्री नायडु ने लोकतंत्र की रक्षा और संरक्षण में ’लोकतंत्र के चौथे स्तंभ’ के रूप में मीडिया की अहम भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मीडिया संचार का महत्वपूर्ण माध्यम है जो लोगों के समस्याओं को सरकार और सरकार की योजनाओं और नीतियों को लोगों तक ले जा सकता है।

    श्री नायडु ने जोर देकर कहा कि मीडिया को सरकार पर सवाल उठाने और आलोचना करने एवं वैकल्पिक समाधान सुझाने का अधिकार होने के साथ-साथ उसकी जिम्मेदारी भी है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया संगठनों को तुच्छ मुद्दों को नहीं उठाना चाहिए और लोगों में दहशत नहीं फैलानी चाहिए।
    लोगों पर मीडिया के जबरदस्त प्रभाव को देखते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि पत्रकारों को उनके द्वारा प्रकाशित व प्रसारित समाचार के प्रत्येक शब्द का समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि ’उन्हें याद रखना चाहिए कि वे भी समाज का हिस्सा हैं।’
    श्री नायडु ने महामारी के दौरान पत्रकारों के लचीलेपन और साहस की सराहना की और कहा कि उन्होंने जमीनी स्तर पर रिपोर्ट लाने में बहुत साहस और संकल्प दिखाया है।
    इस अवसर पर, श्री नायडू ने अग्रणी तेलुगु पत्रकार और राष्ट्रवादी समाचार पत्र ’कृष्ण पत्रिका’ के 1907 से 1945 तक संपादक रहे श्री मुत्तनुरी कृष्ण राव को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने तेलुगु युवाओं में देशभक्ति और उस दौरान पत्रकारिता में उच्च मानक स्थापित करने में श्री कृष्ण राव के काम और कृष्णा पत्रिका दोनों के स्थायी प्रभाव का उल्लेख किया।

    स्वतंत्रता आंदोलन में समाचार पत्रों की भूमिका का उल्लेख करते हुए श्री नायडु ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के जोश को जमीनी स्तर पर ले जाने और देशभर में हो रहे परिवर्तनों से लोगों को अवगत कराने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

    उपराष्ट्रपति ने पुस्तक के प्रकाशन के लिए श्री मरुममुला दत्तात्रेय शर्मा की सराहना की और आशा व्यक्त की कि यह वर्तमान पीढ़ी को श्री कृष्ण राव द्वारा स्थापित पत्रकारिता के मूल्यों के उच्च मानकों से अवगत कराएगी।
    कार्यक्रम में तेलंगाना सरकार के सलाहकार डॉ के वी रमनाचारी, शांता बायोटेक के चेयरमैन डॉ वरप्रसाद रेड्डी, रचना टेलीविजन प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक अध्यक्ष श्री तुम्माला नरेंद्र चैधरी, वरिष्ठ पत्रकार श्री के रामचंद्र मूर्ति, श्री वल्लेश्वर, लेखक श्री दत्तात्रेय शर्मा, संपादक श्री एमवीआर सरमा, दर्शनम व अन्य ने भाग लिया।

  • स्वर कोकिला ‘लता मंगेशकर’: हमेशा के लिए टूट गई ‘जिंदगी की लड़ी’ पर आपको भूलाया नहीं जा सकता!

    नई दिल्ली: सुप्रसिद्ध स्वर प्रतिभा की धनी स्वर कोकिला लता मंगेशकर नहीं रहीं। लता दीदी के नाम से प्रसिद्ध लता मंगेशकर छः दशकों से भी अधिक समय तक भारत सहित दुनिया के असंख्य गीत-संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज किया। इंदौर से मुंबई में उनके पदार्पण ने उन्हें भारतीय संगीत की मुख्यधारा में प्रतिष्ठित किया। विरासत में अपने पिता द्वारा मिली गाने की प्रेरणा को लता ने स्वयं को स्वर कोकिला के रूप विश्व फ़लक पर स्थापित किया। बिना स्कूल का मुंह देखे स्वर व गायन प्रतिभा की धनी कब और कैसे सुर, लय व ताल की मर्मज्ञ बन बैठी, यह लता से अच्छा और कोई नहीं जान सकता है। शिक्षा के नाम पर लता ने मुंबई में अपने संघर्ष के दिनों में हिंदुस्तानी संगीत की तालीम उस्ताद अमान अली खान से मराठी और हिंदी भाषा में सीखी। खेलने-कूदने की उम्र से ही अपने पिता से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू करने वाली लता ने रंगमंच में भी अभिनय किया करती थी। लता के गानों में मिठास उनकी नानी के लोकगीतों से उन्हें मिला है। ऐसा कहा जाता है कि लता के अंदर जन्म से सुरीली व झंकार भरी आवाज, बेहतर अभिव्यक्ति और बात को जल्द समझ लेने वाली अविश्वसनीय क्षमता थी। इसकी झलक लता के त्वरित निर्णय इंदौर से मुंबई की ओर मास्टर विनायक के साथ अपनी छोटी बहन आशा को साथ आने में दिखाई भी दिया। सन 1942 में पिता के गुजरने के बाद मात्र 13 साल की उम्र में चार छोटे भाई-बहन हृदयनाथ, मीना, उषा और आशा की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेते हुए आगे की सफर को अकेले तय किया। स्कूल-कॉलेज का मुंह तक नहीं देखा। लता अपने पिता की मौत के बाद परिवार का खर्च चलाने के लिए पहले फिल्मों में अभिनय किया। संगीत को अपना सब कुछ मान बैठी लता ने शादी नहीं की और कुंवारी ही इस दुनिया से प्रस्थान कर गई। संगीत मेरा सब कुछ है। इसलिए लता जी संगीत के नाम का सिंदूर अपनी मांग में आजीवन भरती रही। वे कहती थी कि संगीत नहीं, तो मैं भी नहीं हूँ। लोग कहते हैं न कि, पति परमेश्वर है और ये मांग में जो मैं सिंदूर भरती हूँ , वही मेरा परमेश्वर है, मेरा सब कुछ संगीत है।

    वे इस संदर्भ में सौभाग्यशाली थी कि उनका जन्म एक कुशल मराठी और कोंकणी म्यूजीशियन, क्लासिकल सिंगर और रंगमंच कलाकार दीनानाथ मंगेशकर के मिनी मुंबई जैसे उपनाम वाले शहर इंदौर में हुआ था। और अपने पिता के मित्र और नवयुग चित्रपट मूवी कंपनी के मालिक मास्टर विनायक का भरपूर सहयोग मिला। लता के इतिहास और भूगोल दोनों को बदल कर रख दिया। लता ने अतीत की कठिनाइयों से निकलते हुए स्वर्णिम पथ की ओर बढ़ती गई और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखी।

    पार्श्व गायिका के अतिरिक्त और अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे कभी सोच ही नहीं पायी। लेकिन धीरे-धीरे अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर आपको काम मिलने लगा। लता जी की अद्भुत कामयाबी ने इन्हें फ़िल्मी जगत की सबसे मज़बूत महिला बना दिया था। इन्हीं विशेषताओं के बल पर लता की प्रतिभा को बहुत जल्द एक पहचान मिल गई। फिर भी ऐसा नहीं है कि उन्होंने कठिन परिश्रम और लगन से कभी मन चुराया हो। अपने काम के प्रति ईमानदारी के साथ सदैव लगी रही।

    लता ने अपनी जिंदगी का पहला हिंदी गाना ‘माता एक सपूत की दुनिया बदल दे तू’ को गया जिसे मराठी फिल्म गजाभाऊ के लिए गाया था। लता जब पार्श्वगायन के क्षेत्र में अपना कैरियर बना रही थी तबकी नामी गायिकाओं नूरजहां और शमशाद बेगम जैसी गायिकाओं की शैली की कॉपी न करते हुए अपनी शैली विकसित किया। इसके लिए उन्होंने हिंदी और उर्दू के शब्दों के उच्चारण की बारीकियों को भी सीखी। मिट्टी से जुड़े इस अद्भुत गायन प्रतिभा को सुनना जितना सरल है, गायन कला उतना ही कठिन। सदैव सफ़ेद साड़ी में दिखने वाली स्वर कोकिला का व्यक्तित्व जीवन के मध्यकाल से लेकर संध्याकाल तक सरल और सौम्य रहा। आखिर अंत में यही सौम्यता उनकी पहचान बन गई। इसीलिए उनके अपने जीवन काल में अनेक फिल्म निर्माताओं, निर्देशकों, सांगीतकारों, गायकों, अभिनेताओं और अभिनेत्रियों से पारिवारिक रिश्ते आजीवन कायम रहे। सुरों की नई-नई परिभाषा गढ़ते हुए सर्वाधिक गीत रिकार्ड करने का गौरव लता जी के नाम है। कुल 30 भाषाओं में 50000 से अधिक गाने का रिकार्ड आपके नाम दर्ज है। भारत रत्न सम्मान और दादा साहब फाल्के पुरस्कार के साथ-साथ और अनेक सम्मान से सम्मानित हुई।

    तत्कालीन मशहूर संगीत निर्देशक गुलाम हैदर ने लता मंगेशकर की फिल्म निर्देशक सशाधर मुखर्जी से मिलवाया। लता की पतली आवाज का हवाला देते हुए मुखर्जी ने अपनी फिल्मों में गाना गवाने से मना कर दिया। हालांकि गुलाम हैदर की संगीत पारखी नजर ने लता की स्वर प्रतिभा के खिलाफ बातें सुनने के बाद मुखर्जी से कहा कि साहब आने वाले कल में लता से गाना गवाने के लिए आप तरस जाएंगे, और वही हुआ। लता गायकी और स्वर कोकिला की लता बनकर पूरी दुनिया में छा गई। छः फरवरी 2022 को पूरी दुनिया के प्रशंसकों को छोड़ कर स्वर कोकिला लता चिर यात्रा पर प्रस्थान कर गई।

    लता मंगेशकर: जीवन वृत्त

    लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर, 1929 को मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में हुआ था। इनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक कुशल मराठी रंगमंच के कलाकार थे। इनकी माँ का नाम शेवंती था। दीनानाथ मूलतः गोआ में मंगेशी के रहने वाले थे और इसके आधार पर उन्होंने अपना सरनेम मंगेशकर रखा।  लता स्कूल की पढ़ाई से वंचित रही। 6 फरवरी 2022 को मुंबई में 92 साल की उम्र में निधन हो गया।

    फिल्मों में पार्श्वगायन का सफर

    लता ने सर्वाधिक गीत रिकार्ड करने का गौरव अपने नाम बना रखा है। फ़िल्मी गीतों के अलावा ग़ैरफ़िल्मी गीत भी गाया। लता ने सन् 1947 में, फ़िल्म “आपकी सेवा में” गीत गाकर अपनी प्रतिभा से फिल्म इंडस्ट्री को परिचय कराया। इस गीत ने लता को फिल्म जगत में एक अलग पहचान दिया। आगे चलकर इन्होंने दो आँखें बारह हाथ, दो बीघा ज़मीन, मदर इंडिया, मुग़ल ए आज़म, श्री 420, चोरी चोरी, हाउस नं. 44, देवदास, मधुमती, आजाद, आशा, अमरदीप, बागी, रेलवे प्लेटफार्म, देख कबीरा रोया, चाचा जिंदाबाद, दिल अपना और प्रीत पराई, बीस साल बाद, अनपढ़, मेरा साया, वो कौन थी, आए दिन बाहर के, मिलन, अनीता, शागिर्द, मेरे हमदम मेरे दोस्त, दो रास्ते, जीने की राह जैसी अनेक फ़िल्मों में गाने गाये है। आपने “महल”, “बरसात”, “एक थी लड़की”, “बडी़ बहन” आदि फ़िल्मों में अपनी आवाज़ के जादू से इन फ़िल्मों की लोकप्रियता में चार चाँद लगाए। इस दौरान आपके कुछ प्रसिद्ध गीत थे: “ओ सजना बरखा बहार आई” (परख-1960), “आजा रे परदेसी” (मधुमती-1958), “इतना ना मुझसे तू प्यार बढा़” (छाया- 1961), “अल्ला तेरो नाम”, (हम दोनो-1961), “एहसान तेरा होगा मुझ पर”, (जंगली-1961), “ये समां” (जब जब फूल खिले-1965), सत्यम शिवम सुंदरम, और यशोमती मैया से बोले नंदलाला इत्यादि।

    पुरस्कार

    लता ने अपने गायन प्रतिभा के बल पर भारत सरकार द्वारा प्रदत्त भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण, और दादा साहब फाल्के पुरस्कार। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, सात फिल्मफेयर अवार्ड्स, और महाराष्ट्र राज्य के पांच राज्य फिल्म पुरस्कार और बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा 15 अवार्ड्स प्राप्त किया।

     लेखक: डॉ. शम्भू शरण गुप्त

    Email: naharguptass@gmail.com

    डिप्टी डीन एवं एसोसिएट प्रोफेसर, स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म एंड मास कम्यूनिकेशन

    महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ इंफार्मेशन टेक्नालॉजी, महर्षि नगर, नोएडा सेक्टर 110, गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश

     

  • ब्रिटिश उच्चायुक्त एलेक्स एलिस ने मुंबई में वड़ा पाव आजमाया। इंटरनेट प्रतिक्रिया

    ब्रिटिश उच्चायुक्त एलेक्स एलिस ने मुंबई में वड़ा पाव आजमाया। इंटरनेट प्रतिक्रिया

    भारत में ब्रिटिश उच्चायुक्त, एलेक्स एलिस, फिर से चर्चा में हैं और इस बार प्रसिद्ध महाराष्ट्रीयन व्यंजन वड़ा पाव को आजमाने के लिए।

    क्या आपको याद है कि कैसे भारत में ब्रिटिश उच्चायुक्त एलेक्स एलिस ने दक्षिण भारतीय स्वादिष्ट डोसा का स्वाद चखा था? अगस्त में उनका हाथों से डोसा खाते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। वह इसके हर हिस्से को पसंद करते थे और उनकी प्रतिक्रिया ने नेटिज़न्स का दिल जीत लिया। हालाँकि, इस बार, हाथ में वड़ा पाव लिए उनकी एक तस्वीर ऑनलाइन वायरल हो गई है और हम सुरक्षित रूप से कह सकते हैं कि उन्हें भी यह बहुत पसंद था।

    एलिस, जो इस समय महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री और शीर्ष प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर रही हैं, को गेटवे ऑफ इंडिया के बाहर हाथ में वड़ा पाव लिए खड़े देखा गया। महाराष्ट्र का एक शाकाहारी फास्ट फूड वड़ा पाव एक डीप फ्राइड आलू की पकौड़ी है जिसे पाव के बीच भरकर चटनी और हरी मिर्च के साथ खाया जाता है।

    उन्होंने पोस्ट को कैप्शन दिया, “मुंबई-लाई भारी में वड़ा पाव खाने का हमेशा समय होता है।” उन्होंने ‘लाई भारी’ का इस्तेमाल किया, जो एक देशी महाराष्ट्रीयन वाक्यांश है जिसका अर्थ है ‘इतना महान’।

    यहां पोस्ट देखें:

    उन्होंने अपनी मुंबई यात्रा की शुरुआत गणेश चतुर्थी से पहले एक गणेश कार्यशाला में जाकर की।

    ट्विटर पर अपलोड होने के बाद, उनकी तस्वीर 20,000 से अधिक लाइक्स के साथ वायरल हो गई। नेटिज़न्स ने भारत को पूरी तरह से तलाशने के लिए राजनयिक की भावना को पसंद किया और सिफारिशों के साथ टिप्पणियों की बाढ़ आ गई।

    एक यूजर ने कहा, “खुशी है कि आपको यह पसंद आया। मुंबई में खाने की अद्भुत वैरायटी है।” एक अन्य यूजर ने कमेंट किया, “बॉन भूख।”

    एलेक्स एलिस ने भारत के प्रति अपने पूर्ण प्रेम के कारण सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रियता हासिल की है। मुंबई में डब्बावालों से मिलने से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने के बाद पूरे वीडियो के लिए हिंदी बोलने तक, कमिश्नर के पोस्ट ने नेटिज़न्स को खुश कर दिया है।

    वड़ा पाव, कोई भी?