Category: धर्म

  • श्रीकृष्ण जन्मभूमि: सत्य,तथ्य व कथ्य-भाग-१, विस्तार से बता रहे हैं दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता संतोष पाण्डेय

    श्रीकृष्ण जन्मभूमि: सत्य,तथ्य व कथ्य-भाग-१, विस्तार से बता रहे हैं दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता संतोष पाण्डेय

    मैंने वो समय भी देखा है जब उत्तर प्रदेश में 1991 में, मैं व मेरे तमाम छात्रावासी मित्र “जय श्रीराम” का जयकारा लगाने व गले में भगवा झंडा लपेटने पर सुबह से शाम तक थाने के बंदी गृह में बंद रहे व शाम 5 बजे मुंसिफ साहेब के घर पर निजी मुचलके पर छोड़े गए।

    आज वो समय आया जब प्रभु राम का मंदिर बन रहा है,जहां मुलायम सिंह ने हजारों लोगों की हत्या अपने गुंडों से करवा दिया। वो भी समय आया जब तथाकथित ज्ञानवापी मस्जिद पर रार चल रही है और शत प्रतिशत बाबा आदि विश्वेश्वर विश्वनाथ का भव्य मंदिर बनेगा।

    “हिन्दू मंदिरों का विध्वंस मुस्लिम लुटेरों,बलात्कारियों ने जीभर के किया और उन्हीं मंदिरों के मलबे से औना पौना मस्जिदें खड़ी कर लीं। तो ये है “सत्य” (Truth)”

    “आज इन्हीं चोरों,लुटेरों के नाजायज वंशज 30000 से अधिक मंदिरों पर अवैध रूप से कब्ज़ा कर मस्ज़िद बना उसके मालिक बने बैठे हैं ये है “तथ्य” (Facts)”

    “कांग्रेस व कांग्रेसी,वामपंथी इतिहासकार, तथाकथित परजीवी से बुद्धिजीवी जो गंगा जमुनी संस्कृति की बात करते हैं। औरंगजेब सहित गजनी,गोरी,अकबर,खिलजी,तुगलक की शान में कसीदे पढ़ते हैं और उन्हीं राष्ट्र निर्माता बताते हैं,उनके लिए तमाम अवधारणाएं गढ़ते हैं ताकि आम हिन्दू मानस को दिग्भ्रमित कर मलेच्छओं के कुकर्मों को सही साबित किया जाय। इस देश के,सनातन हिन्दू धर्म के सबसे बड़े हन्ता व गद्दार यही उपरोक्त लोग हैं। इनके द्वारा बनाये विकृत अवधारणा को कहते हैं “कथ्य”(Narrative)”

    अब बात करते हैं हमारे आराध्य व धर्म संस्थापक लीलाधर प्रभु श्रीकृष्ण जन्मभूमि की।
    श्रीकृष्ण जन्मभूमि अर्थात कंस का कारागार। कालांतर में यहां भगवान श्रीकृष्ण की पूजा शुरू हो गयी और यह कार्य सदियों से होताआ रहा है। इस मंदिर को गजनवी,गोरी,खिलजी व अन्य सुल्तानों ने लूटा और इसको ध्वंस भी करते रहे।

    अंततः सन 1618 में बुंदेला राजा बीर सिंह बुंदेला ने 13.37 एकड़ जमीन पर प्रभु कृष्ण जन्मस्थली का भव्य निर्माण कराया। उस समय इस मंदिर को बनाने की लागत 33 लाख रुपये आयी थी।(ये हिसाब दस्तावेजी है,कोई हवा हवाई नहीं है)। दस्तावेजों में लिखा है कि इस मंदिर के सोने की चमक ऐसी थी कि वह चमक आगरा से दिखाई देती थी।

    औरंगजेब 1658 में राजा बना और मथुरा के मंदिर की चमक जब भी दिखती वो आग बबूला हो उठता। 1669 आते आते औरंगजेब का वहशियाना और ज़ालिमाना रुतबा लगभग पूरे उत्तर भारत पर कायम हो चुका था।

    सन 1669 में औरंगजेब ने फरमान जारी किया कि, काशी और मथुरा के मंदिरों को नेस्तनाबूद कर दिया जाय और वैसा ही किया गया। इतिहासकार यदुनाथ सरकार लिखते हैं कि-“औरंगजेब ने ये फरमान भी जारी किया कि,उपरोक्त मंदिर की मूर्तियों को आगरा के जहाँआरा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे रख दो ताकि नमाज़ी कुचलते हुए जाएं हिन्दू देवताओं को”।

    बहरहाल, सन 1770 के गोवर्धन युद्ध में मरहठों ने मुगलिया सेना को हराया व प्रभु श्रीकृष्ण की जमीन मराठा साम्राज्य की हो गयी। सारे मुसलमान अतिक्रमण कर्ता भगा दिए गए या मार दिए गए।

    सन 1803 में अंग्रेजों ने उपरोक्त भूमि को ब्रिटिश राज्य का हिस्सा बना दिया और मंदिर का सारा भूभाग बरतानिया हुकूमत के अधीन हो गया।

    सन 1815 में, राजा पटनीमल (बनारस से ताल्लुक रखते थे) ने जन्मभूमि की समस्त 13.37 एकड़ जमीन अंग्रेजो से नीलामी में खरीद लिया और यह सम्पूर्ण परिसर उनकी सम्पत्ति हो गयी थी। हालांकि,कुछ मुस्लिम इस भूभाग के कुछ हिस्से पर अब अवैध कब्जा किये बैठे थे।

    सन 1875 में इन्हीं मुस्लिमों ने दीवानी वाद दायर किया परन्तु हार गए। सन 1920 में पुनः मुस्लिमों ने दीवानी वाद मथुरा अदालत में डाला जिसमें वो हार गए।मुस्लिम अपील में उच्च न्यायालय गए और उनकी अपील 1935 में खारिज़ हो गयी।

    आगे की कहानी कल के अंतिम भाग में!!

    क्रमशः

    यह कहानी/ फैक्ट दिल्ली उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सन्तोष पांडेय द्वारा लिखी गई है। AVS POST (Asian Voice Standard Post) की तरफ से किसी भी प्रकार का स्वीकरण और अस्वीकरण नहीं है।

  • Chhath Puja 2023: उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ पूरा हुआ छठ महापर्व का व्रत

    Chhath Puja 2023: उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ पूरा हुआ छठ महापर्व का व्रत

    छठ महापर्व: उप्र बस्ती जिले में सूर्य षष्ठी पर्व पर व्रती महिलाओं ने सोमवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर पुत्र और सुहाग के लिए मंगलकामना की। 36 घंटे का निर्जल व्रत रहकर महिलाओं ने उगते सूरज को अर्घ्य देकर छठ व्रत पूरा किया। कुआनो नदी के अमहट घाट और पुरानी बस्ती के निर्मली कुंड पर भोर में ही मंगल गीत गातीं व्रती महिलाओं का झुंड आना शुरू हो गया। इस दौरान पौ फटने से पहले घाटों पर महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी थी। घाट पर प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए थे। ओस और हल्के कोहरे के बीच घाटों पर भगवान सूर्य की उपासना में जुटा महिलाओं का समूह अद्भुत दृश्य उपस्थित कर रहा था। व्रती घुटने भर पानी में खड़े होकर सूप में फल आदि सब लेकर सूर्यदेवता को अर्घ्य देने के लिए प्रस्तुत हुई तो उनके सहयोगी पति ने दूध और जलधार गिराकर अर्घ्य में सहयोग दिया।

    रविवार को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के बाद सोमवार को सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत पूरा किया। साेमवार को अल सुबह से ही अमहट घाट और अन्य स्थानों पर व्रती महिलाओें की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। व्रती महिलाओं ने पूजन स्थल पर वेदिका सजा दी। गन्ने के मंडप में गीत गाते हुए छट्ठी मैया की विधिवत पूजा की। इसके बाद महिलाएं पानी में खड़ी होकर भक्तिभाव से सूर्य की लालिमा फूटने का इंतजार करने लगीं। जैसे ही सूर्य की किरणें फूटीं व्रती महिलाओं ने सूर्य को अर्घ्य दिया। भगवान भास्कर को अर्घ्य अर्पित करने के बाद व्रती वापस वेदिका के सामने पहुंचीं। वेदी के सम्मुख कंद, मूल और फल के साथ ही पूजन के लिए तैयार पकवान रख महिलाओं ने आरती उतारी। प्रणाम कर मनवांछित फल मांगा। नगरपालिका प्रशासन के साथ जिला प्रशासन ने प्रकाश के साथ पेयजल का बंदोबस्त किया था। परंपरागत ढंग से सूर्य की उपासना के बाद छठ का व्रत तोड़ा। इस दौरान नदी के तटों और घाटों काफी भीड़ रही। महत्वपूर्ण पर्व माने जाने वाला सूर्य षष्ठी व्रत में इस बार महिलाओं ने बढ़ चढ़कर भाग लिया।

  • Diwali 2023: दिवाली पर्व का महत्व, विधि विधान और कब मनाई जाएगी, जानिए पूरी डिटेल

    Diwali 2023: दिवाली पर्व का महत्व, विधि विधान और कब मनाई जाएगी, जानिए पूरी डिटेल

    Diwali 2023: दिवाली हिंदू धर्म का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण त्योहार है। यह त्योहार हर साल कार्तिक माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। दिवाली को दीपावली, दीपोत्सव, या धनतेरस के नाम से भी जाना जाता है। यह साल भर का सबसे बड़ा त्यौहार होता है। दिवाली आने से पहले ही लोग अपने घरों की साफ सफाई, साज सजावट और खरीदारी में जुट जाते हैं। दिवाली के लिए देशभर में अलग ही उत्साह और उल्लास देखने को मिलता है।

    दिवाली का महत्व

    दिवाली को प्रकाश का पर्व माना जाता है। इस दिन लोग अपने घरों को रंग-बिरंगे रोशनी से सजाते हैं और दीपक जलाते हैं। दिवाली का पर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। इस दिन लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं और नए सामान खरीदते हैं। दिवाली को धन-धान्य, सुख-समृद्धि और खुशियों का प्रतीक माना जाता है।

    दिवाली की पूजा विधि

    दिवाली के दिन सुबह-सुबह उठकर स्नान कर लें। फिर घर की साफ-सफाई करें और दीपक जलाएं। इसके बाद मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करें। पूजा में रोली, चंदन, अक्षत, फूल, माला, घी का दीपक, मिठाई और दक्षिणा अर्पित करें। पूजा के बाद आरती करें।

    दिवाली की पूजा सामग्री

    • रोली
    • चंदन
    • अक्षत
    • फूल
    • माला
    • घी का दीपक
    • मिठाई
    • दक्षिणा

    दिवाली की तारीख 2023

    2023 में दिवाली 12 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन शाम को 5:38 बजे से लेकर 7:35 बजे तक लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त रहेगा।

    दिवाली के दिन कुछ महत्वपूर्ण बातें

    • दिवाली के दिन अपने घर के दरवाजे और खिड़कियों पर रोली और चंदन से स्वास्तिक बनाएं।
    • दिवाली के दिन नए कपड़े पहनें और अपने परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं।
    • दिवाली के दिन जरूरतमंदों को दान करें।

    दिवाली एक ऐसा त्योहार है जो लोगों को एक साथ लाता है और खुशियां बांटने का अवसर देता है। यह त्योहार हमें अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश देता है।

  • Shrimad Bhagwat Katha: भगवान कृष्ण की दिव्य प्रेम और लीलाएं,उज्जैन से द्वारका की यात्रा

    Shrimad Bhagwat Katha: भगवान कृष्ण की दिव्य प्रेम और लीलाएं,उज्जैन से द्वारका की यात्रा

    उन्होंने बताया कि शरद पूर्णिमा की रात को, कृष्ण ने अपनी अद्वितीय मुरली से 84 कोस ब्रजमण्डल को आवाहन दिया। जैसे-जैसे गोपियाँ ने कृष्ण की ध्वनि सुनी, वे अपने कार्यों को छोड़कर उनके पास आईं। उनका प्रेम कृष्ण के प्रति असीम था, जैसे कृष्ण के पादों की धूल के कण के समान।

    कृष्ण ने महसूस किया कि गोपियों के दिल में गर्व की रेखा हो गई है, तो उन्होंने क्षणिक रूप से अपने से दूर हो जाया। लेकिन जब गोपियाँ अपने प्रेम में उल्लासित होकर उन्हें पुकारीं, उनकी यह पुकार गोपी गीत के रूप में आई। कृष्ण, उनके अतल प्रेम के साथ, फिर से रास के नृत्य में शामिल हो गए।

    शिव के भोलेनाथ रूप में भी एक बार वहां आये और पार्वती माता के साथ रास खेले, जिससे उन्हें “गोपेश्वर महादेव” का नाम मिला।

    छह महीने तक, गोपियों ने कृष्ण के साथ रास का आनंद लिया, और फिर अपने घरों को लौट आईं। इसके बाद, श्री प्रभु प्रिया जी ने कृष्ण के महान दुर्भाग्यवान भक्त कंस के वध की कथा सुनाई, जिससे मथुरा के लोगों को मुक्ति मिली।

    भगवान ने अपने माता-पिता, वासुदेव और देवकी, को कारागार से छुड़ाया और फिर मथुरा में आकर अपनी शिक्षा लेने का आश्रय लिया। उन्होंने अवंतिका पुरी, जिसे उज्जैन के रूप में भी जाना जाता है, में गुरु सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की।

    इस पवित्र यात्रा का सफर जारी रहा, जब कृष्ण ने अपने साथ बलराम जी को लिए द्वारका नामक नगर की स्थापना की, छोड़कर युद्ध भूमि से होकर।

    बलराम के विवाह के बाद, भगवान कृष्ण का खुद का विवाह उनकी प्रियतमा, देवी रुक्मिणी के साथ हुआ, और यह आयोजन भगवान कृष्ण की दिव्य प्रेम और उनके भक्तों के आदर्श का प्रतीक बन गया। पंडाल में खुशी के साथ-साथ भक्तों का सजीव भावना से समर्पण हुआ, और उनका प्रेम अपार था।

    इस दिव्य यात्रा के साथ-साथ, भगवान कृष्ण का उज्जैन से द्वारका का सफर, दिव्य प्रेम की दिनों से दिन तक चलने वाली शक्ति और उपनिषदी गोपियों के भगवान के प्रति प्रेम के बने सबूत के रूप में है।

  • श्रीमद्भगवत कथा :”नंद घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की ”  कथा में मनाया गया कृष्ण जन्मोत्सव

    श्रीमद्भगवत कथा :”नंद घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की ” कथा में मनाया गया कृष्ण जन्मोत्सव

    नोएडा: सेक्टर 93 के श्रमिक कुंज प्रथम के शिव मंदिर परिसर में चल रही श्रीमद्भगवत कथा के चौथे दिन कथा व्यास विनोद कृष्ण जी महाराज ने कृष्ण जन्म की कथा का रोचक प्रसंग सुनाता। कंस अपने पिता उग्रसेन को राजगद्दी से उतारकर खुद राजा बन बैठा ,उसने अपनी बहन देवकी का विवाह वासुदेव से कर दिया।जब कंस अपनी बहन को विदा करता है तो आकाशवाणी होती है कि देवकी का आठवां लाल तेरा काल होगा। कंस वासुदेव को मारने दौङता है लेकिन देवकी के समझाने पर कि वह अपनी सभी संतानों को उसे सौंप देंगे। कंस बासुदेव व देवकी को कारागार में डाल देता है। उनकी पैदा होने वाली संतानों को उसने एक एक कर मार डाला। आठवीं संतान के रूप में भगवान कृष्ण के रूप में जन्म लेते हैं और वासुदेव जी गोकुल में नंद के यहां कृष्ण को छोड़कर आ जाते हैं और उनकी कन्या को लेकर वापस मथुरा आ जाते हैं। नंद बाबा के यहां कृष्ण का जन्म धूमधाम से मनाया जाता है। कृष्ण जन्मोत्सव पर कथा पंडाल को गुब्बारों से सजाया गया, व्यास जी द्वारा गाए गए भक्तिगीतों “नंद घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की ” पर सेक्टरवासी जमकर थिरके। आयोजन समिति के प्रवक्ता राघवेंद्र दुबे ने बताया कि 12 दिसंबर को भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं एवं गोवर्धन पूजा की कथा का वर्णन व्यास जी करेंगे।
    इस अवसर पर समिति के प्रवक्ता राघवेंद्र दुबे, मुख्य यजमान श्यामानंद मिश्रा, पंडित महादेव शर्मा, पंडित महेश पाठक शास्त्री, रवि राघव, सुशील पाल,राजेश राघव,राजेश ध्यानी, बालेंद्र सिंह,संटू मिश्रा, प्रमोद यादव, महेंद्र कौशिक,के एन पांडे, राजेश सिंह, अनिल शर्मा, राजवीर सिंह, रमेश चंद्र शर्मा सहित तमाम भगवत्प्रेमी भक्त मौजूद रहे।

  • Noida में देव दीपावली की धूम, 1100 दीयों की रोशनी से जगमगाया सेक्टर 82 का ये मंदिर

    Noida में देव दीपावली की धूम, 1100 दीयों की रोशनी से जगमगाया सेक्टर 82 का ये मंदिर

    नोएडा: #Noida सेक्टर 82 के पॉकेट 7 स्थित शिव मंदिर परिसर में विगत वर्ष की भांति देव दीपावली बड़ी धूम धाम से मनाई गई। रवि राघव के संयोजन में भक्तों ने मंदिर परिसर में दिये जलाकर परिसर को 1100 दीपों की रोशनी से जगमग किया। लक्ष्मी नारायण भगवान एवं भगवान शिव की आराधना के बाद आरती हुई और प्रसाद वितरित किया गया।


    इस अवसर पर राघवेंद्र दुबे ने बताया कि देव दीपावली का विशेष महत्व है। मंगलवार को चंद्र ग्रहण होने के कारण एक दिन पहले ही देव दीपावली मनाई जा रही है । पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध कर उसके अत्याचारों से देवताओं को मुक्त किया था इसी खुशी में देवताओं ने दीप जलाये थे। ऐसी मान्यता भी है कि भगवान विष्णु चार माह की योग निद्रा से जागते हैं तब देवताओं ने खुशी में दीप प्रज्ज्वलित कर उन्हें प्रसन्न किया इसलिए इसे देव दीपावली के नाम से जाना जाता है। इस दिन विशेषकर गंगा घाटों पर दीपदान की परंपरा है। कार्तिक पूर्णिमा को तुलसी पूजा,व्रत , दान का विशेष महत्व है।

     

    इस अवसर पर रवि राघव, अंगद सिंह तोमर, हरि शंकर सिंह, संजय पाण्डेय , रमेश दास, संगम प्रसाद मिश्रा,देव मणि शुक्ल, सीमा सिंह, रश्मि राघव, भावना पांडे, ललिता तोमर,गौरी,कृष्ण, रीता मिश्रा,सीमा शुक्ला, पुष्पा दास सहित तमाम भक्तजन मौजूद रहे।

  • Chhath Puja: नहाए खाए के साथ शुरु हुआ छठ पर्व, नोएडा के घाटों पर जोरशोर से चल रही हैं तैयारियां

    Chhath Puja: नहाए खाए के साथ शुरु हुआ छठ पर्व, नोएडा के घाटों पर जोरशोर से चल रही हैं तैयारियां

    नोएडा:  #ChhathPujaलोक आस्था का महापर्व छठ बिहार, झारखंड समेत पूरे पूर्वांचल में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है. उत्तर प्रदेश के नोएडा में भी छठ महापर्व की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं. नोएडा भर में 80 स्थानों पर कृत्रिम तरीके से घाट बनाकर छठ पूजा की तैयारी चल रही है साथ ही नोएडा सेक्टर 110 छठ घाट पर भी तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी है.नोएडा के सेक्टर 110 स्थित छठ घाट पर छठ पर्व बड़े धूम धाम से मनाया जाता है.  प्रवासी छठ पूजा समिति नोएडा के अध्यक्ष जेपी मंडल ने बताया कि हमने दिवाली के बाद से घाट निर्माण शुरू कर दिया था. यहां पर आसपास की सोसायटी और श्रमिक कुंज में रहने वाले लोग पूजा करने आते हैं. 

    28 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक होगी पूजा

    सूर्योपासना का महान छठ पर्व 28 अक्टूबर को कार्तिक शुक्ल चतुर्थी के दिन नहाय-खाय के साथ शुरू हो रहा है। 29 अक्टूबर को कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन खरना की पूजा होगी। 30 अक्टूबर को कार्तिक शुक्ल षष्ठी के सायंकाल अस्ताचलगामी भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। 31 अक्टूबर को कार्तिक शुक्ल सप्तमी के सुबह उदीयमान भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। 

    सांस्कृतिक कार्यक्रमों का होगा आयोजन 

    प्रवासी छठ पूजा समिति नोएडा के अध्यक्ष जेपी मंडल ने बताया कि यहां पर पूजा के दौरान दूर-दराज से भी लोग आते हैं इसलिए उनके रहने की भी व्यवस्था की जाएगी. पूरी रात सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा. यह सब सुविधा लोगों के लिए मुफ्त में उपलब्ध कराई जाएगी. मिली जानकारी के मुताबिक सेक्टर 110 के छठ घाट पर प्रसिद्ध भोजपुरी गायिका क्षमा पांडेय, प्रीति प्रकाश और विकास पांडे सहित कई गायकों और गायिकाओं द्वारा भोजपुरीऔर हिंदी में गीत-संगीत का कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाएगा। 

     

     

     

  • सर्वपितृ अमावस्या (25 सितम्बर) के दिन श्राद्ध क्यों करना चाहिए और इससे क्या-क्या लाभ होंगे ?

    सर्वपितृ अमावस्या (25 सितम्बर) के दिन श्राद्ध क्यों करना चाहिए और इससे क्या-क्या लाभ होंगे ?

    निरहू जोशी , अहमदाबाद(M-7838880134)

    🛕 श्राद्ध विशेष ज्ञानामृत 🛕

    सर्वपितृ अमावस्या (25 सितम्बर) के दिन श्राद्ध क्यों करना चाहिए और इससे क्या-क्या लाभ होंगे ?जानिए….

    *हिन्दू धर्म का व्यक्ति अपने जीवित माता-पिता की सेवा तो करता ही है, उनके देहावसान के बाद भी उनके कल्याण की भावना करता है एवं उनके अधूरे शुभ कार्यों को पूर्ण करने का प्रयत्न करता है। ‘श्राद्ध-विधि’ इसी भावना पर आधारित है। इस साल सर्वपितृ अमावस्या 25 सितंबर को है।*

    *पुराणों में आता है कि आश्विन (गुजरात-महाराष्ट्र के मुताबिक भाद्रपद) कृष्ण पक्ष की अमावस्या (पितृमोक्ष अमावस्या) के दिन सूर्य एवं चन्द्र की युति होती है। सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है। इस दिन हमारे पितर यमलोक से अपना निवास छोड़कर सूक्ष्म रूप से मृत्युलोक (पृथ्वीलोक) में अपने वंशजों के निवास स्थान में रहते हैं। अतः उस दिन उनके लिए विभिन्न श्राद्ध करने से वे तृप्त होते हैं।*

    *गरुड़ पुराण में लिखा है, “अमावस्या के दिन पितृगण वायुरूप में घर के दरवाजे पर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं। जब तक सूर्यास्त नहीं हो जाता, तब तक वे भूख-प्यास से व्याकुल होकर वहीं खड़े रहते हैं। सूर्यास्त हो जाने के पश्चात वे निराश होकर दुःखित मन से अपने-अपने लोकों को चले जाते हैं। अतः अमावस्या के दिन प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। यदि पितृजनों के पुत्र तथा बन्धु-बान्धव उनका श्राद्ध करते हैं और गया-तीर्थ में जाकर इस कार्य में प्रवृत्त होते हैं तो वे उन्हीं पितरों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करने का अधिकार प्राप्त करते हैं। उन्हें भूख-प्यास कभी नहीं लगती। इसीलिए विद्वान को प्रयत्नपूर्वक यथाविधि शाकपात से भी अपने पितरों के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।*

    *राजा रोहिताश्व ने मार्कण्डेयजी से प्रार्थना की: ‘‘भगवन् ! मैं श्राद्धकल्प का यथार्थरूप से श्रवण करना चाहता हूँ।*

    *मार्कण्डेयजी ने कहा: ‘‘राजन् ! इसी विषय में आनर्त-नरेश ने भर्तृयज्ञ से पूछा था। तब भर्तृयज्ञ ने कहा था: ‘राजन्! विद्वान पुरुष को अमावस्या के दिन श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। क्षुधा से क्षीण हुए पितर श्राद्धान्न की आशा से अमावस्या तिथि आने की प्रतीक्षा करते रहते हैं। जो अमावस्या को जल या शाक से भी श्राद्ध करता है, उसके पितर तृप्त होते हैं और उसके समस्त पातकों का नाश हो जाता है।*

    *आनर्त-नरेश बोले: ‘ब्रह्मन्! मरे हुए जीव तो अपने कर्मानुसार शुभाशुभ गति को प्राप्त होते हैं, फिर श्राद्धकाल में वे अपने पुत्र के घर कैसे पहुँच पाते हैं?*

    *भर्तृयज्ञ: ‘राजन् ! जो लोग यहाँ मरते हैं उनमें से कितने ही इस लोक में जन्म लेते हैं, कितने ही पुण्यात्मा स्वर्गलोक में स्थित होते हैं और कितने ही पापात्मा जीव यमलोक के निवासी हो जाते हैं। कुछ जीव भोगानुकूल शरीर धारण करके अपने किये हुए शुभ या अशुभ कर्म का उपभोग करते हैं।*

    *राजन् ! यमलोक या स्वर्गलोक में रहनेवाले पितरों को भी तब तक भूख-प्यास अधिक होती है, जब तक कि वे माता या पिता से तीन पीढ़ी के अंतर्गत रहते हैं। जब तक वे मातामह, प्रमातामह या वृद्धप्रमातामह और पिता, पितामह या प्रपितामह पद पर रहते हैं, तब तक श्राद्धभाग लेने के लिए उनमें भूख-प्यास की अधिकता होती है।*

    *पितृलोक या देवलोक के पितर श्राद्धकाल में सूक्ष्म शरीर से श्राद्धीय ब्राह्मणों के शरीर में स्थित होकर श्राद्धभाग से तृप्त होते हैं, परंतु जो पितर कहीं शुभाशुभ भोग हेतु स्थित हैं या जन्म ले चुके हैं, उनका भाग दिव्य पितर लेते हैं और जीव जहाँ जिस शरीर में होता है, वहाँ तदनुकूल भोगों की प्राप्ति कराकर उसे तृप्ति पहुँचाते हैं।*

    *ये दिव्य पितर नित्य और सर्वज्ञ होते हैं। पितरों के उद्देश्य से शक्ति के अनुसार सदा ही अन्न और जल का दान करते रहना चाहिए। जो नीच मानव पितरों के लिए अन्न और जल न देकर आप ही भोजन करता है या जल पीता है, वह पितरों का द्रोही है। उसके पितर स्वर्ग में अन्न और जल नहीं पाते हैं। श्राद्ध द्वारा तृप्त किये हुए पितर मनुष्य को मनोवांछित भोग प्रदान करते हैं।*

    *आनर्त-नरेश : ‘ब्रह्मन्! श्राद्ध के लिए और भी तो नाना प्रकार के पवित्रतम काल हैं, फिर अमावस्या को ही विशेषरूप से श्राद्ध करने की बात क्यों कही गयी है ?*

    *भर्तृयज्ञ : ‘राजन् ! यह सत्य है कि श्राद्ध के योग्य और भी बहुत-से समय हैं। मन्वादि तिथि, युगादि तिथि, संक्रांतिकाल, व्यतीपात, चंद्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण- इन सभी समयों में पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध करना चाहिए। पुण्य-तीर्थ, पुण्य-मंदिर, श्राद्धयोग्य ब्राह्मण तथा श्राद्धयोग्य उत्तम पदार्थ प्राप्त होने पर बुद्धिमान पुरुषों को बिना पर्व के भी श्राद्ध करना चाहिए। अमावस्या को विशेषरूप से श्राद्ध करने का आदेश दिया गया है, इसका कारण है कि सूर्य की सहस्रों किरणों में जो सबसे प्रमुख है उसका नाम ”अमा” है। उस “अमा” नामक प्रधान किरण के तेज से ही सूर्यदेव तीनों लोकों को प्रकाशित करते हैं। उसी “अमा” में तिथि विशेष को चंद्रदेव निवास करते हैं, इसलिए उसका नाम अमावस्या है। यही कारण है कि अमावस्या प्रत्येक धर्मकार्य के लिए अक्षय फल देनेवाली बतायी गयी है। श्राद्धकर्म में तो इसका विशेष महत्त्व है ही।*

    *श्राद्ध की महिमा बताते हुए ब्रह्माजी ने कहा है: ‘यदि मनुष्य पिता, पितामह और प्रपितामह के उद्देश्य से तथा मातामह, प्रमातामह और वृद्धप्रमातामह के उद्देश्य से श्राद्ध-तर्पण करेंगे तो उतने से ही उनके पिता और माता से लेकर मुझ तक सभी पितर तृप्त हो जायेंगे।*

    *जिस अन्न से मनुष्य अपने पितरों की तुष्टि के लिए श्रेष्ठ ब्राह्मणों को तृप्त करेगा और उसीसे भक्तिपूर्वक पितरों के निमित्त पिंडदान भी देगा, उससे पितरों को सनातन तृप्ति प्राप्त होगी।*

    *पितृपक्ष में शाक के द्वारा भी जो पितरों का श्राद्ध नहीं करेगा, वह धनहीन चाण्डाल होगा। ऐसे व्यक्ति से जो बैठना, सोना, खाना, पीना, छूना-छुआना अथवा वार्तालाप आदि व्यवहार करेंगे, वे भी महापापी माने जाएंगे। उनके यहाँ संतान की वृद्धि नहीं होगी। किसी प्रकार भी उन्हें सुख और धन-धान्य की प्राप्ति नहीं होगी।*

    *यदि श्राद्ध करने की क्षमता, शक्ति, रुपया-पैसा नहीं है, तो श्राद्ध के दिन 1 पानी का लोटा भरकर रखें फिर भगवद्गीता के सातवें अध्याय का पाठ करें और 1 माला द्वादश मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” तथा एक माला “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा” की करें और लोटे में भरे हुए पानी से सूर्य भगवान को अर्घ्य दें, फिर 11.36 से 12.24 के बीच के समय (कुतप वेला) में गाय को चारा खिला दें। चारा खरीदने का भी पैसा नहीं है, ऐसी कोई समस्या है तो उस समय दोनों भुजाएँ ऊँची कर लें, आँखें बंद करके सूर्यनारायण का ध्यान करें: ‘हमारे पिता को, दादा को, फलाने को आप तृप्त करें, उन्हें आप सुख दें, आप समर्थ हैं। मेरे पास धन नहीं है, सामग्री नहीं है, विधि का ज्ञान नहीं है, घर में कोई करने-करानेवाला नहीं है, मैं असमर्थ हूँ,लेकिन आपके लिए मेरा सद्भाव है, श्रद्धा है। इससे भी आप तृप्त हो सकते हैं। इससे आपको मंगलमय लाभ होगा।*

  • भगवान की मूर्ति छूने पर लगा 60 हजार का जुर्माना, इस रिपोर्ट के जरिए जानिए पूरा मामला

    भगवान की मूर्ति छूने पर लगा 60 हजार का जुर्माना, इस रिपोर्ट के जरिए जानिए पूरा मामला

    कर्नाटक के कोलार जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसे सुनने के बाद लगता है कि हमारा समाज आज भी अपनी दकियानूसी विचार से बाहर नहीं निकला है। यहां पर दलित लड़के के मूर्ति छू देने मात्र से उसे 60 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया है। इस सजा से दुखी दलित महिला ने अब जीवन में कभी भी मंदिर नहीं जाने का फैसला लिया है। महिला का कहना है कि वह अब जीवनभर अंडेकर की पूजा करेगी। दलित परिवार से आने वाले शोबम्मा का कहना है कि अगर भगवान हमे पसंद नहीं करते हैं, हम डॉक्टर बीआर अंबेडकर की पूजा करेंगे। बता दें कि शोबम्मा को 1 अक्टूबर तक 60 हजार रुपए का जुर्माना भरने का समय दिया गया है। दरअसल शोबमा के बेटे ने अपने गांव में धार्मिक कार्यक्रम के दौरान एक पिलर को छू दिया था। शोबम्मा कोलरा जिले के मलूर तालुक में स्थित उल्लेरहल्ली में रहती हैं। जोकि बेंगलुरू से तकरीबन 60 किलोमीटर दूर है। 9 सितंबर को उन्हें उनके बेटे की वजह से यह सजा सुनाई गई है।

    छूने से मूर्ति हुई अपवित्र !

    यह पूरा मामला उस वक्त सामने आया जब शोबम्मा ने इस पूरे वाकये को कोलार स्थित एक दलित संगठन के सामने बताया। 8 सितंबर को ग्रामीण भूतयम्मा मेला का आयोजन कर रहे थे, इस कार्यक्रम में दलितों के आने पर पाबंदी थी, पूरे गांव में स्थित देवी के मंदिर में दलितों के आने की अनुमति नहीं थी। जब यह कार्यक्रम हो रहा था तो शोबम्मा का 15 साल का बेटा बाहर था। इसी दौरान उसने सिदिरन्ना की मूर्ति से जुड़े एक पिलर को छू दिया। बता दें कि दक्षिण भारत के गांवों में सिदिरन्ना देवी की काफी मान्यता है। वेंकटेशप्पा जोकि एक ग्रामीण हैं उन्हें बच्चे को देख लिया और कहा कि वह गांव के बुजुर्गों के सामने पेश हो।

    60 हजार जमा करने का फरमान

    अगले दिन जब शोबम्मा गांव के बुजुर्गों के सामने आईं तो वह बहुत नाराज थीं क्योंकि उन्हें 1 अक्टूबर तक 60 हजार रुपए का जुर्माना भरने के लिए कहा गया है। उन्होंने बताया कि अगर वह जुर्माना नहीं देती हैं तो उन्हें गांव से बाहर कर दिया जाएगा। स्थानीय लोगों के अनुसार गांव में 75-80 घर हैं और अधिकतर परिवार वोक्कलिगा समुदाय से जुड़ा है। गांव में 10 शेड्यूल कास्ट के परिवार हैं। शोबम्मा का घर गांव के बाहरी इलाके में है, जहां वह अपने लड़के के साथ रहती हैं, उनका लड़का कक्षा 10वीं का छात्र है और तेकल गांव स्थित स्कूल में पढ़ता है।

    वहीं कोलार के डिप्टी कमिश्नर वेंकट राजा ने बताया कि मैं बुधवार को गांव गया, परिवार से मिला। हमने उन्हें घर बनाने के लिए एक प्लॉट दिया है, हमने उन्हें कुछ पैसे भी दिए हैं। हम शोबम्मा को रोजगार देंगे। मैंने पुलिस को भी इसकी जानकारी दी है कि आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाए। पुलिस ने पूर्व ग्राम पंचायत सदस्य नारायणस्वामी, प्रधान के पति वेंकटेशप्पा व अन्य के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। बता दें कि कर्नाटक में इस तरह की घटनाएं नई नहीं हैं। पिछले साल कोप्पल जिले के मियापुर गांव में दलित परिवार पर 25 हजार का जुर्माना लगाया गया था क्योंकि दलित परिवार का लड़का मंदिर में चला गया था।

     

  • जानिए, अहमदाबाद का बिश्नोई समाज पीएम मोदी से नाराज क्यों हैं?

    जानिए, अहमदाबाद का बिश्नोई समाज पीएम मोदी से नाराज क्यों हैं?

    नीरव जोशी ,अहमदाबाद (M-783888034)

    अहमदाबाद जिला कलेक्टर को बिश्नोई समाज के लोगों ने सौंपा ज्ञापन

    मोदी जी के जन्मदिवस पर नामीबिया से 8 सीते भारत लाकर मध्य प्रदेश के गुना अभ्यारण मैं छोड़ने के पश्चात उनके भोजन हेतु करीब 180 हीरन लाकर उनके भोजन के लिए छोड़े जा रहे हैं जो निंदनीय हैं इसी संदर्भ में बिश्नोई समाज के लोगों ने आज जिला कलेक्टर अहमदाबाद मैं प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन शॉप कर हिरण प्राणियों को जीवन दान देने की गुहार लगाई बिश्नोई समाज में हिरणों को बच्चों का दर्जा है हम समाज के बच्चों को इस तरह मरते नहीं देख सकते इस जीव हत्या के विरोध में बिश्नोई समाज और पूरे सतीश को में भारी रोष है समय रहते इस पर अंकुश नहीं लगाया गया तो पूरे भारतवर्ष में आंदोलन होगा ।बिश्नोई समाज प्रकृति प्रेमी है आज के ही दिन 21 सतेंबर 1730 को खेजडली गांव के खेजड़ी के पेड़ के लिए 363 नर नारी शहीद हुवे थे वो विश्व में एक मात्र उदाहरण है बिश्नोई समाज पेड़ ,जीव जंतु ,से अद्भुत प्रेम करते है। इस चिता प्रोजेक्ट का हिरण हत्या के कारण घोर विरुद्ध करते है इस विरुद्ध में आज श्री बिश्नोई समाज ट्रस्ट अहमदाबाद व अखिल भारतीय बिश्नोई जीव रक्षा सभा के नेतृत्व में कलेक्टर को ज्ञापन दिया गया ।

     

     

    इस मौके पर भेराराम गोदारा अध्यक्ष बिश्नोई सेवा ट्रस्ट अहमदाबाद जय किशन गोदारा अध्यक्ष जीव रक्षा गुजरात मांगीलाल खिलेरी जिला परिषद सदस्य देवेंद्र लोमरोड बाबूलाल खिलेरी गोपीलाल खिलेरी मनोहर गोदारा सेवाड़ा भगवाना राम कुराडा अरनाय,ओमप्रकाश साऊ रनोदर भैराराम गिला जगदीश साहू भेराराम कावा बंसीलाल लोमरोड ,विजय राज सारण भागीरथ सारण बीरबल मांजू मांगीलाल एचरा भागीरथ सेवर सरवण पुरोहित रमेश साहू लादूराम विडारा भागीरथ सारण हरीश गोदारा मानाराम जानी मांगीलाल बांगरवा नरेश खिलेरी कैलाश भादू भागीरथ गोदारा ,सरवन बेनीवाल , गोपाल गोदारा राजू गोदारा प्रकाश बांगडवा पूनमाराम गोदारा समाज के सैकड़ों लोग उपस्थित रहे