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  • अँधेरा जानलेवा था” : आत्मचेतना और अस्तित्व की खोज को स्वर देती विद्या त्रिपाठी की कविता

    अँधेरा जानलेवा था” : आत्मचेतना और अस्तित्व की खोज को स्वर देती विद्या त्रिपाठी की कविता

    अँधेरा जानलेवा था” : हिंदी साहित्य में आत्ममंथन, चेतना और अस्तित्व की अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने वाली कविताएं हमेशा पाठकों के मन को गहराई से छूती रही हैं। ऐसी ही संवेदनशील भावनाओं को शब्द देती हैं कवयित्री विद्या त्रिपाठी, जिनकी कविता “अँधेरा जानलेवा था” भीतर के संघर्ष, घुटन और आत्मबोध की यात्रा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है।

    कविता में कवयित्री ने उस मानसिक अंधेरे को चित्रित किया है, जो व्यक्ति को भीतर ही भीतर तोड़ता रहता है। लेकिन जब आत्मचेतना का दीप जलता है, तब वही व्यक्ति अपने अस्तित्व और अस्मिता को पहचान पाता है। कविता की पंक्तियां जीवन के उस मोड़ को दर्शाती हैं, जहां बाहरी भीड़ और शोर के बीच दब चुकी आत्मा फिर से उजाले में लौटती है।

    विद्या त्रिपाठी की लेखनी की खासियत यह है कि वे सरल शब्दों में गहरे मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक भावों को व्यक्त करती हैं। उनकी यह कविता निराशा से आशा, अंधेरे से प्रकाश और खोए हुए अस्तित्व से आत्मपहचान तक की यात्रा का सशक्त चित्रण करती है।

    मूल कविता

    अँधेरा जानलेवा था

    जब दीप नहीं जला था,
    अंतर्मन का,
    जब नहीं मिली थी मैं,
    चेतना से,
    एक घुटन, एक कड़वाहट,
    रहती थी अस्तित्व की धारा पर,
    ये अंधियारा मार ही डालता,
    अपने निराशा वाले नाखूनों से,
    नोच-नोच कर,
    हर रात और घने अंधेरे में धकेलता था,
    तब जब मैं सब के साथ थी,
    अब मैंने खुद को पाया,
    अपनी अस्मिता को सहलाया,
    और मध्यम रोशनी चेतना की,
    आत्मा के मंदिर में जलाया,
    उस रोशनी में जगमगा उठा,
    मेरा अस्तित्व जो चुप हो गया था,
    बाहरी भीड़ की तेज आवाज में।


    लेखिका परिचय

    नाम: विद्या त्रिपाठी
    शिक्षा:

    • स्नातक (हिंदी)
    • परास्नातक M.A. (हिंदी)
    • B.Ed (हिंदी)

    विद्या त्रिपाठी हिंदी साहित्य की गंभीर अध्येता और संवेदनशील रचनाकार हैं। उनकी रचनाओं में आत्मचिंतन, सामाजिक संवेदनाएं और स्त्री-अस्मिता के स्वर प्रमुखता से दिखाई देते हैं।