Category: संपादकीय

  • Union Budget 2025 : ₹12 लाख तक की आय पर कोई income tax नहीं

    Union Budget 2025 : ₹12 लाख तक की आय पर कोई income tax नहीं

    Union Budget 2025

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट 2025 पेश करते हुए घोषणा की, “मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि अब ₹12 लाख तक की आय पर कोई आयकर नहीं लगेगा।”

     ₹12 लाख तक की आय पर कोई आयकर नहीं
    संशोधित कर स्लैब से मध्यम वर्ग को राहत
    बढ़ी हुई डिस्पोजेबल इनकम से उपभोग में वृद्धि की उम्मीद

     मिडिल क्लास के लिए बड़ी राहत

    शनिवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आम Budget 2025-26 पेश करते हुए मिडिल क्लास   के करदाताओं को बड़ी राहत दी। उन्होंने घोषणा की कि जो लोग सालाना ₹12 लाख तक कमाते हैं, उन्हें नई Tax व्यवस्था के तहत कोई आयकर नहीं देना होगा।

    उन्होंने लोकसभा में कहा, “ मिडिल क्लास हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। उनके योगदान को स्वीकार करते हुए, हमने समय-समय पर Tax का बोझ कम किया है। अब मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि ₹12 लाख तक की आय पर कोई आयकर नहीं लगेगा।”

    Budget 2025 : नई Tax व्यवस्था के तहत संशोधित आयकर स्लैब

    आय सीमा (₹ में) कर दर (%)
    0 – 4 लाख शून्य (Nil)
    4 – 8 लाख 5%
    8 – 12 लाख 10%
    12 – 16 लाख 15%
    16 – 20 लाख 20%
    20 – 24 लाख 25%
    24 लाख से अधिक 30%

    आर्थिक प्रभाव और सरकार की रणनीति

    Union Budget 2025 इस बार के आयकर स्लैब में किए गए बदलावों से सलारिएद वर्ग पर फाइनेंसियल बोझ कम होगा। इससे लोगों के पास अधिक डिस्पोजेबल इनकम (खर्च करने योग्य आय) बचेगी, जिससे खपत और बाजार की मांग में वृद्धि होगी।

    सरकार के इस कर सुधार का मुख्य उद्देश्य लोगों की बाइंग शक्ति (purchasing power) बढ़ाना और आर्थिक विकास को गति देना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव से बचत, निवेश और छोटे व्यवसायों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

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    यह फैसला हाल के वर्षों में आयकर दरों में सबसे बड़े बदलावों में से एक है और इसके दूरगामी आर्थिक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। 

  • India-Bangladesh भारत-बांग्लादेश संबंध: खतरे की घंटी या मात्र अफवाह? मोहन भागवत की राय

    India-Bangladesh भारत-बांग्लादेश संबंध: खतरे की घंटी या मात्र अफवाह? मोहन भागवत की राय

    India-Bangladesh भारत-बांग्लादेश संबंध:

    India-Bangladesh भारत-बांग्लादेश संबंध : हाल ही में नागपुर, महाराष्ट्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के स्थापना दिवस पर मोहन भागवत ने बांग्लादेश से उठ रही चिंताओं को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश में कुछ चर्चाएं भारत को एक खतरे के रूप में पेश कर रही हैं, जिसके तहत पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के खिलाफ एक रक्षा रणनीति बनाने का सुझाव दिया गया है। भागवत ने इसे क्षेत्र में मौलिकवादी प्रभावों का परिणाम बताया और हिंदू एकता की आवश्यकता पर जोर दिया।

    भारत- बांग्लादेश (India-Bangladesh) संबंधों पर चिंताएं:

    भागवत ने अपने भाषण में कहा कि बांग्लादेश में कुछ समूह भारत के खिलाफ नकारात्मक नारे लगा रहे हैं, जिससे क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति प्रभावित हो सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह स्थिति एक बुरे राजनीतिक माहौल का संकेत देती है। उनका मानना है कि ऐसी चर्चाएं केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए खतरनाक हो सकती हैं।

    राजनीतिक चर्चा का स्वरूप (India-Bangladesh):

    भागवत ने भारत के राजनीतिक वातावरण पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों के स्वार्थी हित अक्सर राष्ट्रीय गौरव और अखंडता को प्रभावित करते हैं। उन्होंने हाल में जम्मू-कश्मीर में हुए चुनावों के शांतिपूर्ण आयोजन पर संतोष व्यक्त किया, लेकिन चेतावनी दी कि कुछ “खतरनाक साजिशें” देश को अस्थिर करने के प्रयास में हैं।

    सशक्त हिंदू पहचान की आवश्यकता (India-Bangladesh):

    अपने भाषण में, भागवत ने हिंदुओं को संगठित होने और बाहरी खतरों से बचने की अपील की। उन्होंने बांग्लादेश में हाल के राजनीतिक और सामाजिक मामलों को संदर्भित करते हुए कहा कि ऐसे विचारों को फैलने से रोकना आवश्यक है।

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    कोलकाता हिंसा की निंदा

    भाजपा के बयान के संदर्भ में, भागवत ने कोलकाता में हाल में हुई एक हिंसक घटना की निंदा की, जिसे उन्होंने अपराध, राजनीति और सामाजिक मुद्दों के बीच एक चिंताजनक मिश्रण बताया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की मजबूत राष्ट्रीय पहचान और हिंदुओं की एकता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।

    इस संदर्भ में, यह स्पष्ट है कि भागवत ने भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का समर्थन किया है, ताकि हिंदू समाज को अपनी पहचान बनाए रखने और सुरक्षित रखने में मदद मिल सके।

    निष्कर्ष

    मोहान भागवत के बयान ने न केवल भारत-बांग्लादेश (India-Bangladesh) संबंधों को फिर से ध्यान में लाया है, बल्कि देश के भीतर राजनीतिक संवाद के स्तर को भी चुनौती दी है। यदि ऐसे विचारों को बढ़ावा मिलता है, तो यह स्थिति न केवल बांग्लादेश के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए समस्याजनक हो सकती है।

  • पड़ताल- पश्चिम यूपी में बीजेपी के सामने ये 5 बड़ी चुनौतियां

    पड़ताल- पश्चिम यूपी में बीजेपी के सामने ये 5 बड़ी चुनौतियां

    नई दिल्ली: यूपी में चुनाव बेहद दिलचस्प होने लगा है। स्वामी प्रसाद मौर्य फैक्टर ने यूपी में बीजेपी की ‘एज’ को बिगाड़ दिया है। अभी तो नुकसान हो चुका है। अगर पहले दौर में पश्चिमी यूपी की 58 सीटों की बात की जाए तो यहां बीजेपी ‘खाई’ में लग रही है। ये 5 फैक्टर महत्वपूर्ण हैं।
    1- बीएसपी प्रमुख मायावती की ‘धीमे चलो वाली स्ट्रैटेजी’ कहीं न कहीं बीजेपी के खिलाफ जा रही है। बीएसपी के कट्टर वोट बैंक को मायावती का मुखर न होना खलने लगा है और इसके चलते बीजेपी विरोधी दलित वोट भी एसपी को ओर ‘शिफ्ट’ होता लग रहा है। शहरी इलाकों में भले ही अभी भी बीजेपी के पक्ष में रुझान दिख रहा है, लेकिन किसानों वाली बेल्ट में समाजवादी पार्टी और आरएलडी गठबंधन की ओर ‘एज’ है। इसको बराबर कर पाना बीजेपी के लिए अब आसान नहीं होगा, क्यों वोटिंग में ज्यादा समय नहीं बचा है। दूसरा फैक्टर है मुस्लिम वोटर्स की रणनीतिक चुप्पी साध लेना। औवेसी की भड़काने वाली तकरीरें हों या बीएसपी की मुसलिम प्रत्याशी उतारने की रणनीति। मुसलिम वोटर्स इस बार सीधे बीजेपी को हरा पाने की क्षमता केवल समाजवादी पार्टी में ही देख रहा है। जिस कन्फ्यूजन से बीजेपी को हर बार फायदा मिलता रहा है, इस बार वो बहुत ही कम लग रहा है। यानी बीएसपी ने अगर कोई बड़ी रणनीति नहीं अपनाई तो बीजेपी और एसपी-आरएलडी गठबंधन के बीच सीधा मुकाबला होगा। शायद इसीलिए योगी को 80 बनाम 20 फीसदी का जुमला उछालना पड़ा ।
    2- किसान आन्दोलन के चलते मुसलिम और जाट वोटर्स के बीच बनी खाई काफी हद तक भर चुकी है। गुर्जर बेल्ट में अभी भी बीजेपी को मुखर समर्थन है, लेकिन जाट बेल्ट अब आरएलडी के साथ दिख रही है। इसका सीधा फायदा अखिलेश यादव को होता लग रहा है। लगता नहीं है कि बीजेपी के पास अब कोई चमत्कारिक रणनीति बची है। मोदी और योगी के भाषण कुछ कमाल कर पाएं तो अलग बात है।
    3- गन्ने के दाम योगी सरकार ने बढाए तो लेकिन काफी देर से। इसका गुस्सा भी गन्ना बेल्ट के किसानों में है। अब बीजेपी डैमेज कंट्रोल के लिए सब कुछ कर रही है, लेकिन लगता नहीं है कि इतने कम समय में ये हो पाएगा। कोरोना महामारी की दूसरी लहर में जब ऑक्सीजन संकट आया था, उसमें योगी सरकार को काफी डैमेज हुआ था, लेकिन लगता है कि उसको कंट्रोल कर लिया गया। हालांकि विपक्ष के समर्थक अभी भी लोगों को गंगा में तैरते शवों की याद दिला रहे हैं। सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर की जा रही है, इसका भी असर पड़ सकता है।
    4- पिछले पांच साल में बीजेपी के चुने गए मंत्री और विधायक भी लोगों को इतने पावरफुल नहीं दिखाई दिए, जिसके कारण कार्यकर्ताओं में तनिक असंतोष है। इसलिए अगर किसान आन्दोलन की तर्कों से निपटने के लिए बीजेपी के कार्यकर्ता इस बार बहुत ज्यादा मुखर नहीं हो पा रहे हैं। हालांकि लगता है आरएसएस की मदद से बीजेपी आखिरी तक इस कमी से पार पा लेगी। लेकिन ये भी एक फैक्टर तो है ही।
    5- चुनाव के नतीजों का आंकनल करना अभी बहुत जल्दबाजी होगी, लेकिन बीएसपी के वोटर्स का रुझान आखिरी तक क्या रहता है, ये भी काफी कुछ तय करेगा। पश्चिमी यूपी के गांवों में दस फीसदी और शहरों में करीब 15 से 18 फीसदी तक दलित वोटर का रुझान महत्वपूर्ण होगा। अगर ये मायावती के साथ बना रहा तो त्रिकोणीय मुकाबले के कारण बीजेपी का नुकसान कम होगा। उसके बाद बीजेपी के भीतर ये ताकत तो है कि वो ‘डैमेज कंट्रोल’ कर सकती है। सो देखते रहिए।
    यह पड़ताल वरिष्ठ पत्रकार नवीन पाण्डेय के फेसबुक वॉल से ली गई है वो हाल ही में पश्चिमी यूपी के दौरे से लौटे हैं। आप सभी इस पर अपनी राय कमेंट के जरिए दे सकते हैं।
  • मनी और हेल्थ प्लानिंग में क्यों कमजोर हैं हिन्दी पत्रकार?

    मनी और हेल्थ प्लानिंग में क्यों कमजोर हैं हिन्दी पत्रकार?

    अधिकतर पत्रकार अपनी सेहत के प्रति भी चौकस नहीं रहते

    पत्रकारिता में बीते दो-ढ़ाई दशकों से मनी प्लानिंग और निवेश मेरा प्रिय लेखन-विषय रहा है। मैं हमेशा हैरान रहा कि पूरे देश को राह दिखाने वाले पत्रकारों में से बहुतरे को मैंने मनी प्लानिंग में बेहद कमजोर पाया। अंग्रेजी पत्रकारों की तुलना में हिन्दी पत्रकार बचत, जीवन-मेडिकल बीमा, पीपीएफ खातों और पीएफ अंशदान के बारे में लापरवाह हैं। इस पर सरकार या पत्रकार संगठन एक सर्वें करा ले तो पता लगेगा कि देश के बहुत सारे पत्रकार जिंदगी में अर्थ के महत्व को एकदम नहीं समझते। हाल ही ऑनलाइन जॉब पोर्टल मॉन्स्टर ने देश का ताजा सैलरी इन्डेक्स जारी किया है। इस इन्डेक्स के मुताबिक देश में पत्रकारों की औसत तनख़्वाह 43,849 रुपये प्रतिमाह है। (वैसे औसत का खेल गड़बड़ है। इसमें करोड़ों का पैकज पाने वाले संपादकों और कम वेतन पाने वाले स्ट्रिंगर का वेतन साथ जोड़ दिया जाता है।) इस औसत वेतन से आप खुद अंदाजा लगाइए कि पत्रकारों की माली हालत कैसे सुधरेगी? आखिर वे निवेश के लिए कहां से रकम लाएं? बीमा के लिए पैसे का बंदोबस्त कैसे करें?

    जिस देश में पत्रकारों की नियमित नौकरी की चिंता सरकार को नहीं है वहां उनकी पेंशन की चिंता कौन करे? रिटायरमेंट के बाद मेरे पिताजी को सरकार से जितनी पेंशन मिलती थी उतना वेतन दस-बीस साल का अनुभव होने पर भी पत्रकार को नहीं मिलता…पर असम सरकार ने पत्रकारों के लिए सराहनीय रिटायरमेंट पेंशन योजना लागू की है। श्रमजीवी और मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए 8,000 रुपये प्रति माह पेंशन देने का प्रावधान है। इसी तरह तमिलनाडु में इसी महीने पत्रकारों के लिए पेंशन बढ़ाने की घोषणा की गई। मौजूदा आर्थिक हालात को देखते हुए पत्रकाराें की पेंशन आठ हजार से बढ़ाकर 10 हजार रुपये प्रतिमाह की जा रही है। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने श्रमजीवी पत्रकारों की सुध ली तो मैं भी लखनऊ पोस्टिंग के दौरान इस पेंशन योजना का लाभकारी बन गया। तब मैं राष्ट्रीय सहारा में था। पर बहुत सारे पत्रकारों को ऐसी पेंशन भी नसीब नहीं है।

    यह सच है कि महानगरों में काम करने वाले बहुतेरे पत्रकार जैसे-तैसे आर्थिक रूप से संपन्न हैं, मगर छोटे शहरों व कस्बों में काम करने वाले पत्रकारों की दशा आज इतनी दयनीय है कि उनकी कमाई से परिवार के लोगों को दो वक्त का खाना मिल जाए, वही बहुत है। हां, यह बात अलग है कि कुछ पत्रकार गलत तरीके से पैसे कमाकर आर्थिक रूप से संपन्न हो रहे है, लेकिन ज्यादातर पत्रकारों को प्रेस की स्वतंत्रता के बावजूद न केवल कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ रहा है, बल्कि उनकी जान पर भी खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।

    मुझे लगता है कि मीडिया मालिक जान-बूझकर चाहते हैं कि पत्रकारों को मनी मैनेजमेंट की समझ कभी नहीं आए नहीं तो वे बेहतर पैकेज की मांग पर जोर डालेंगे। दैनिक जागरण देश का सबसे बड़ा अखबार होने का दावा करता है। जब मैंने वहां नौकरी शुरू की तो पता चला कि वहां तो बहुतेरे पत्रकार आईटी रिटर्न ही नहीं भरते हैं। कंपनी को भी इसकी फिक्र नहीं थी। यही हाल राष्ट्रीय सहारा समेत तमाम अखबारों में था। (पर लोकमत में आईटी रिटर्न के प्रति पत्रकारों में चेतना थी।) मैंने कुछ पत्रकार साथियों को समझाया कि आईटी रिटर्न भरने के आधार पर बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए एजुकेशन लोन लिया, कार खरीदी। होम लोन भी लिया जिसकी किस्त अब भी भर रहा हूं। पर अधिकतर पत्रकार न आईटी रिटर्न भरना चाहते थे और न ही लोन लेना चाहते थे। पर मैंने उन्हें इसका महत्व बताने का अभियान जारी रखा। जब भी काम से फुर्सत मिलती तो मैं अपने जूनियर साथियों को अकेले या ग्रुप में इसका महत्व समझाता। आधे से अधिक साथियों पर इसका असर पड़ा और वे आईटी रिटर्न भरने लगे। इससे बहुतेरे पत्रकारों की आर्थिक जिंदगी में बदलाव आने लगा।

    इसका लाभ उन्हें यह मिला कि बैंक ने इनमें से कई को आईटी रिटर्न और मौजूदा वेतन के आधार पर फ्लैट खरीदने पर आसानी से होम लोन दे दिया। तब गाजियाबाद के इंदिरापुरम, वैशाली और वसुंधरा में बहुत सारे पत्रकारों ने तीन से पांच लाख रुपये में फ्लैट खरीद लिए जिसकी कीमत 14-15 साल में छह-सात गुना तक बढ़ गई।

    पर इधर दो-तीन साल से एनसीआर में हमारे कुछ पत्रकार साथी होम लेने के बाद भी बिल्डरों से फ्लैट न मिलने के कारण बहुत ही चिंतित हैं। उनकी गाढ़ी कमाई और होम लोन की किश्त बिल्डर डुबाने पर तुले हुए हैं। खेद है कि सरकार उनकी मदद भी नहीं करना चाहती। इन ईमानदार पत्रकारों का भरोसा टूट रहा है कि आम्रपाली, गार्डेनिया या सुपरटेक सरीखी रियल एस्टेट कंपनियां उन्हें इस जन्म में फ्लैट का पजेशन देंगी। ये पत्रकार बैंक की किस्त छह-सात साल से भर रहे हैं पर उन्हें फ्लैट नहीं मिल रहा। इस कारण मैं अब पत्रकारों को “रेडी टू मूव” फ्लैट लेने की सलाह देता हूं। मैं अब इस बात पर भी जोर देता हूं कि अभी चार-पांच साल तक फ्लैट खरीदने की योजना रोक दें तो इससे उनका भला होगा। एनसीआर में अधिक फ्लैट बन जाने के कारण आजकल यूं ही फ्लैट का किराया सस्ता हो गया है।

    मैं पहले भी कह चुका हूं कि हिन्दी के अधिकतर पत्रकार अपनी सेहत के प्रति भी चौकस नहीं रहते। अखबार मालिकों और टीवी कंपनियों को भी उनके हेल्थ की चिंता नहीं। निरंतर रात्रि ड्यूटी कर तमाम संस्करण निकालने से उनकी सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ता है। पर भला इसकी चिंता किसे? दस साल पहले दैनिक जागरण के नोएडा स्थित मुख्यालय में सीजीएम निशीकांत ठाकुर की पहल पर योगा सिखाने के लिए सप्ताह में शनिवार को एक गुरु आते थे। पर मैंने पाया कि कुछ पत्रकार योग-कक्षाओं में रुचि नहीं लेते थे जबकि उनके लिए यह फायदेमंद है। इससे न केवल उनकी सेहत और स्मरण शक्ति बढ़ती बल्कि रक्त की धमनियां भी स्वच्छ होतीं। धीरे-धीरे योग गुरु ने दैनिक जागरण में आना बंद कर दिया और पत्रकार भी योग करना भूल गए। पर मेरी निजी जानकारी है कि इधर 10-15 फीसदी पत्रकारों में चेतना आई है और वे और उनकी पत्नी योग कर अपनी सेहत ठीक रखने का प्रयास करते हैं। मीडिया संसंथानों में मैंने हेल्थ कैम्प का आयोजन बहुत कम देखा।

    नौकरी के दौरान कुछ पत्रकारों की असमय मौत भी मैंने देखी। लोकमत, सहारा, जागरण और अमर उजाला में नौकरी में सेवारत पत्रकारों की मौत पर एक दिन का वेतन अंशदान में देने का रिवाज है। इससे पत्रकारों के परिवार का कुछ भला हो जाता है। पर बहुतेरे पत्रकार जीवन बीमा नहीं कराते इससे उनके परिवार को बीमा की एकमुश्त रकम नहीं मिल पाती। मेरे वक्त में पाटलिपुत्र टाइम्स में पीएफ का अंशदान कभी जमा ही नहीं हुआ।हां, जागरण, लोकमत, टाइम्स, हिन्दुस्तान में पीएफ की कटौती वाले पत्रकारों को अब रिटायर होने या मौत होने पर दावेदार को पीएफ की एक मुश्त रकम और लगभग तीन हजार मासिक पेंशन मिल जाती है। कुछ मीडियां कंपनियां अपने पत्रकारों और उनके जीवनसाथी का पिछले 15-20 साल से मेडिकल बीमा भी कर रही हैं। पर यह मेडिकल बीमा 1 से 5 लाख से अधिक नहीं है। अग्रणी मीडिया कंपनियां कम से कम पांच साल नौकरी करने पर ग्रेच्युटी का भी भुगतान कर देती। पर 90 फीसदी मीडिया संस्थान ऐसा नहीं करते। अगर कोई सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं तो सरकार उन्हें आधे रेट पर रेल टिकट देने के साथ ही सीजीएचएस की मेडिकल सुविधा भी देती है। पर यह सुविधा रिपोर्टर और संपादक को ही नसीब है।

    पत्रकारों को नौकरी कब मिले और कब चली जाए, कोई नहीं जानता। मीडिया को सही मायने में स्वतंत्र कैसे बनाया जाए, देश की कार्यपालिका इस पर गंभीरता से सोचे ही नहीं उसको अमल में भी लाए। भोपाल के पत्रकार शिवराज सिंह की प्रतिभावान बेटी ने परिवार की आर्थिक तंगी से परेशान होकर खुदकुशी कर ली। वह आठवीं की छात्रा थी। उसके पत्रकार पिता को कुछ दिन पहले एक प्रमुख दैनिक अखबार की नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद से वे आर्थिक तंगी से गुजर रहे थे। स्कूल की टॉपर उनकी बेटी पिता पर बोझ नहीं बनना चाहती थी, इसलिए उसने जान दे दी। पत्रकारों के कमजोर मनी मैनेजमेंट का खामियाजा उनके परिवार को भुगतना पड़ता है। सवाल है कि इस पिता ने शुरू से ही मनी मैनेजमेंट प्लान क्यों नहीं बनाया ताकि नौकरी छूटने पर बच्चों की परवरिश मुश्किल न हो। अगर वह इस मामले में कमजोर थे तो उन्हें शादी नहीं करनी चाहिए थी। पर मेरे इस लेख का यह आशय नहीं है कि सभी पत्रकार मनी मैनेजमेंट में कमजोर होने के कारण परिवार को गहरे मुसीबत में ढकेल देते होंगे। कुछ पत्रकार अकेले घर नहीं चलाते। उनके जीवनसाथी भी नौकरी या बिजनेस कर घर को आर्थिक मजबूती देते, इससे कभी नौकरी छूट जाए या रिटायर्ड हो जाएं तो उन्हें आर्थिक तंगी से नहीं गुजरना पड़ता। पर ऐसे पत्रकारों की संख्या दस फीसदी भी नहीं है।

    लेखक: Roy Tapan Bharati

  • वोट सभी को चाहिए लेकिन जनता के सवालों का जवाब कोई नहीं देना चाहता!

    वोट सभी को चाहिए लेकिन जनता के सवालों का जवाब कोई नहीं देना चाहता!

    आज के दौर में देश के वर्तमान हालात पर जरुर चर्चा होनी चाहिए। महंगाई, बेरोजगारी, कोरोना से उत्पन्न स्थिति पर चर्चा किए जाने की जरुरत है। न्यूज चैनल, अखबार और पत्रिकाओं के माध्यम से जनता को सजग और आगाह भी करने की जिम्मेदारी हमीं लोगों पर है। केंद्र और राज्य सरकारें जनता के प्रति जिम्मेदारी कितनी निभानें कामयाब हुई हैं और शपथ लेने वाले उच्च पदों पर असीन जैसे- प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों समेत सभी जन प्रतिनिधि ने जनहित में क्या कार्य किए इस पर पब्लिक बहस होनी चाहिए।

    इसके साथ ही पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस सिलेंडर और खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ने से जनता को कितना परेशानी हो रही है। इस पर भी बहस होनी चाहिए। इनके दाम क्यों बढ़े और जनता से इससे राहत क्यों नहीं मिल रही है इसका जवाब केंद्र और राज्य सरकारों को देना चाहिए। जो जनता हर चीज खरीदने पर सरकारों को टैक्स दे रही है उसका उपयोग कितना सार्थक तरीके से किया जा रहा है यह सभी जो जानने का हक है।

    अब बात करते हैं नेताओं और उनके द्वारा किए गए वादों पर। महंगाई, भ्रष्टाचार और लोकलुभावने वादे कर सत्ता में आने वाले नेताओं को यह बताना चाहिए कि पेट्रोल-डीजल और खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ने के पीछे की वजह क्या है। जब वह विपक्ष में थे तो सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करने उतरते थे अब क्यों वह बोल नहीं रहे हैं। मैं ऐसे कई नेताओं को जानता हूं जिनकी पार्टी सत्ता में आ गई है और वे मंत्री या संगठन में बड़े पद हैं लेकिन मौन हैं। क्या यह जनता के साथ धोखा नही है। उदाहरण के लिए अगर किसी विधायक या सांसद को बोला जाए कि उन्हें सरकार में मंत्री बनाया जाएगा। सरकार बनने के बाद मंत्री तो दूर उन्हें उनके हक से भी वंचित किया जाए तो कैसा लगेगा। अब बात करते हैं विपक्ष की। जब वे सरकार में थे तो महंगाई पर कुछ नहीं बोलते थे अब वे सड़कों पर हैं। उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए पहले वे चुप क्यों थे और अब उन्हें जनता की फिक्र क्यों हैं। कहीं वह राजनीतिक रोटी तो नहीं सेंक रहे या फिर जले पर नमक तो नहीं छिड़क रहे। वोट तो दिए अब भुगतो..।

    अब बात करते हैं कोरोना के टीकाकरण की। अस्पतालों, सार्वजनिक जगहों और मीडिया संस्थानों को दिए गए विज्ञापन में मुफ्त टीकाकरण का जोरशोर से प्रचार किया जा रहा है। बहुत से लोगों की शिकायत है कि उन्हें टीके के लिए स्लाट नही मिल रहा है। अस्पताल जाने पर बोला जाता है कि टीका खत्म है। जब थोड़ा बहुत टीका आ जाता है तो भीड़ इतनी लगती है कि पूछो मत। क्या पोलिया अभियान की तरह कोरोना का टीका भी घर-घर नही लगाया जा सकता। इससे भीड़ से बचाव के साथ ही कोरोना के खतरे को भी कम किया जा सकता है। मेरे कई जानने वालों ने मुझे फोन कर कहा कि टीका लगवा दीजिए। जब हमनें किसी जानने वाले को फोन किया तो पता चलता है एक-दो दिन रुक जाओ अभी टीका खत्म है। लोगों की शिकायत है जितना विज्ञापन पर पैसे खर्च किए जा रहे हैं उतना वैक्सीन पर हो तो लोगों को परेशान न होना पड़े। वैक्सीन वास्तव में उपलब्ध है या नहीं खैर यह तो जांच का विषय है।

    अरोग्य सेतु एप से लोगों को कितना फायदा हुआ यह भी सरकार को बताना चाहिए। अगर यह ऐप कोरोना से बचाव के लिए बनाया गया था तो इतनी भीषण तबाही कैसे हुई। अगर कारगर साबित नहीं हुआ तो क्यों। ताकि कमी को दूर कर भविष्य के लिए तैयारी की जा सके। अक्सर सरकारें चुनाव नजदीक होने पर मेडिकल हॉस्पिटल व प्राथमिक अस्पतालों की घोषणाएं करती रही हैं। सत्ता में आने पर उसका कितना बनवाए और कितना लाभ मिला यह भी जनता को बताना चाहिए। राज्यों में जिसकी भी सरकारें हैं अक्सर मौत के आंकड़े छिपाने का आरोप लगते हैं। इसकी भी स्वतंत्र एजेंसी से जांच होनी चाहिए। संसद में पिछले दिनों कहा गया ऑक्सीजन से कोई मौत नही हुई। जहां तक मुझे पता है जनता चाहे वह किसी भी पार्टी को वोट देती हो यह स्वीकार करने को तैयार नहीं। फिर क्यों जले पर नमक छिड़का जा रहा है। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान शायद ही कोई बचा होगा जो बीच के किसी को न खोया हो। इलाज के अभाव और ऑक्सीजन की कमी से मौत के लिए सभी जिम्मेदार सरकारों को जनता से माफी मांगनी चाहिए। अगर कोई काम ठीक से हो सका तो जनता को उसकी वजह बताकर यह विश्वास दिलाना चाहिए आगे से ऐसा नही होगा।

    अब बात करते हैं सरकार की योजनाओं का लाभ जनता को मिल रहा है या नहीं। आजकल बारिश का मौसम है। जगह-जगह जलभराव की शिकायतें मिल रही हैं। जिस भी क्षेत्र या शहर को स्मार्ट सिटी घोषित किया गया है वहां भी जलजमाव की शिकायतें है। उच्च पदों पर आसीन लोगों को यह बताना चाहिए कि स्मार्ट सिटी बनाने के दौरान जो वादे किए गए थे वह कहां गए। जब जनता टैक्स दे रही है तो वह समस्याएं क्यों झेले। आखिर टैक्स के पैसे कहां इस्तेमाल हो रहे हैं। रोड खराब, सरकारी अस्पताल और सरकारी स्कूलों की बदतर हालत क्यों है। जब नेता सरकारी आवास, बिजली पानी और तमाम सुविधाएं ले रहे हैं तो सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को क्यों नहीं पढ़ाते। बीमार होने पर सरकारी अस्पतालों में इलाज क्यों नहीं कराते। कुछ जाने-माने सरकारी अस्पतालों को छोड़ दें तो शेष सरकारी अस्पतालों में नेता और उनके परिजन क्यों नहीं जाते। इसका कारण भी जनता को बताना चाहिए या फिर कोई भी सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने से इनकार कर देना चाहिए। जनता के टैक्स से करोड़पति नेताओं को कोई भी सुविधा नही मिलनी चाहिए। क्योंकि वह उस योग्य हैं अपने खर्च का वहन स्वंय कर सकते हैं। ऐसा मेरा मत है। पांच साल तक सांसद, विधायक रहने के बाद मिलनी वाली सुविधाएं और पेंशन भी बंद होनी चाहिए। देश के लिए सर्वोच्य बलिदान देने वाला महान है या नेता। सेना में कार्यरत सभी को सब मुफ्त मिलनी चाहिए और सम्मान भी।

    देश में बेरोजगारी दर कितनी बढ़ी इस भी चर्चा होनी चाहिए। महंगाई से परेशान जनता के लिए सरकार क्या कर रही है। यह सभी के समक्ष रखनी चाहिए। सरकारी संस्थानों को प्राइवेट के हाथों में सौंपने के पीछे की वजह भी जनता को बतानी चाहिए। क्या सरकार से ज्यादा योग्य प्राइवेट संस्थान हैं।

    अब बात करते हैं विपक्ष की भूमिका पर। जासूसी कांड को लेकर विपक्ष संसद नही चलने दे रही। अच्छा होता वह पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई को लेकर सदन में सरकार को घेरती और कीमतें कम करने के लिए सरकार पर दबाव बनाती। इससे जनता की सहानभूति भी मिलती और सहयोग भी। जासूसी किसकी हुई और किसकी नहीं हुई इससे विपक्ष शायद इसलिए परेशान है कि क्योंकि वह उससे जुड़ा मुद्दा है। तो क्या जनता के वोट से सांसद बने लोग अपने हित की बात ही सदन में रखेंगे। अगर ऐसा है तो वह शपथ क्यों लेते हैं। जब केद्र सरकार कह रही है जासूसी नहीं हुई तो उसे विपक्ष की मांगे मानने में क्या दिक्कत है। अगर कोई जासूसी नहीं हुई तो केंद्र सरकार को भी जांच करवाकर जनता को बताना चाहिए कौन सच्चा है और कौन झूठा।

    इस खबर के लेखक टीवी पत्रकार मंगल यादव जी हैं जो समसामयिक मुद्दों पर अपनी राय खुल कर रखते है। 

  • यूपी में ‘चुनावी फिल्म’ चालू है, दावों की ‘बरसात’ के बीच जनता के हाथ कुछ नहीं लगने वाला!

    यूपी में ‘चुनावी फिल्म’ चालू है, दावों की ‘बरसात’ के बीच जनता के हाथ कुछ नहीं लगने वाला!

    उत्तर प्रदेश में 2022 का रण सज चुका है और रणबांकुरे सत्ता फतह करने के लिए अपने-अपने गुणा गणित में लग गए हैं। सत्ता की बारीकी समझने वाले राजनेता कोरोना काल में जनता के दिल में जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। कहीं ब्राह्राण सम्मेलन किया जा रहा है तो कहीं दलितों और अन्य पिछड़े वर्ग की जातियों पर डोरे जा रहे हैं। जाति-धर्म की राजनीति करने से ऊपर उठकर कार्य करने का दावा करने वाले राजनीतिक दल और नेता फिर से अब इसी में डुबकी लगाने को तैयार हैं। बहाना है अमुक जाति के लोग पिछड़े हैं, फलां जाति-धर्म के लोगों को सत्ता में अभी तक भागीदारी नहीं मिली है। इसे दिलाने के लिए लड़ाई लड़ी जा रही है। सत्ता का स्वाद चखने वाले और स्वाद की मजा ले चुके लोग बड़ी ही चतुराई से कोई न कोई ऐसा मुद्दा जरुर छेड़ दे रहे हैं ताकि जनता का ध्यान उसकी दयनीय दशा से भटकाया जा सके।

    प्रदेश में सत्ता पर काबिज भाजपा और मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रही समाजवादी पार्टी की तरफ से प्रदेश भर में रोजाना कोई न कोई राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं ताकि चुनाव पूर्व माहौल बनाया जा सके। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां अपने किए गए कार्यों का बखान विज्ञापनों द्वारा कर रहे हैं वहीं, पार्टी के बड़े नेता राजनीतिक दौरा कर रहे हैं। अभी हाल में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी और गृह मंत्री अमित शाह ने मिर्जापुर में विकास कार्यों का उद्घाटन व शिलान्यास किया। बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी आगे भी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी समेत अन्य जिलों का दौरा कर और विकास कार्यों का उद्घाटन करते रहेंगे। वहीं, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत अन्य बड़े नेता भी अब लगभग हर महीने उत्तर प्रदेश का दौरा करेंगे। ताकि पार्टी के पक्ष में माहौल बनाया जा सके।

    वहीं समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी चुनाव से पहले पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने में जुट गए हैं। प्रदेश भर में साइकिल रैली के अलावा अन्य राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसके साथ ही भाजपा सरकार की नाकामियों को जनता को बता रहे हैं। इनमें कोरोना की दूसरी लहर के दौरान सरकार का कुप्रबंधन, इलाज और ऑक्सीजन की कमी से बड़ी संख्या में हुई मौतें, बेरोजगारी, पेट्रोल-डीजल के लगातार बढ़ रहे दाम और महंगाई जैसे मुद्दे शामिल हैं। ये ऐसे मुद्दे हैं जो जनता को सीधे तौर पर हिट कर रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी सरकार के दौरान किए गए विकास कार्यों और योगी सरकार के कार्यों की तुलना कर जनता को स्पष्ट संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वे ही अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में जनता के घावों पर मरहम लगा सकते हैं। अखिलेश यादव का आरोप है कि सीएम योगी सपा सरकार के कार्यों का क्रेडिट योजनाओं का नाम बदलकर ले रही है यहां तक कि उद्घाटन किए गए विकास कार्यों का अपना बता कर फिर से उद्धाटन या तो किए गए या फिर किए जा रहे हैं।

    अब बात करते हैं ब्राह्राण वोट बैंक की। जिस पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा), समाजवादी पार्टी(सपा), कांग्रेस और सतारुढ़ भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) की नजर है। हाल-फिलहाल में इस वोट बैंक जोरो से चर्चा है। कथित तौर पर ब्राह्राण मौजूदा भाजपा सरकार से नाराज हैं। इसका फायदा उठाने के लिए बसपा, सपा और कांग्रेस पुरजोर तरीके से कोशिश कर रहे हैं। पहले कांग्रेस की ब्राह्राण वोट बैंक पर मजबूत पकड़ थी जोकि समय के साथ अन्य दलों के साथ बंट गई। ब्राह्राण वोट बैंक के सहारे प्रदेश में सरकार बना चुकीं मायावती दोबारा से उसी फार्मूले पर काम करना शुरू कर चुकी हैं। इसकी जिम्मेदारी उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को सौंपी हैं। सतीश चंद्र मिश्रा प्रदेश के जिलों में ब्राह्राण सम्मेलन कर रहे हैं जिसे बाद में ‘प्रबुद्ध वर्ग विचार संगोष्ठी’ का नाम दिया गया। इन सम्मेलनों में ‘जय भीम-जय भारत’ के अलावा ‘जय श्रीराम’ और ‘जय परशुराम’ के नारे भी लगते हैं। दलित और ब्राह्राण गठजोड़ के जरिए मायावती लंबे समय से सत्ता का सूखा खत्म करना चाह रही हैं।

    सतीश चंद्र मिश्र ब्राह्मण समाज की एकजुटता पर जोर देते हुए अक्सर कहते हैं कि 13 फीसद ब्राह्मण अगर 23 फीसद वाले दलित समाज के साथ मिलकर बसपा का साथ दें तो मायावती को फिर से मुख्यमंत्री बनने से कोई रोक नही सकता।

    सपा भी ब्राह्राणों पर डाल रही डोरे

    सपा मुखिया अखिलेश यादव भी ब्राह्राणों को रिझाने के लिए पार्टी के ब्राह्राण चेहरों को मिशन पर लगा दिया है। सपा यह बताने में नही चूक रही है कि उनकी सरकार के दौरान ब्राह्राण नेताओं को मंत्री बनाकर किस तरह से सम्मान दिया गया था। बताया जा रहा है कि सपा नेता भगवान परशुराम की 108 फीट मूर्ति बनवा रहे हैं। जिसे लखनऊ में स्थापित किया जाएगा। इसकी पुष्टि सपा नेता और पूर्व मंत्री अभिषेक मिश्रा भी कर चुके हैं। इसके अलावा महान क्रांतिकारी रहे मंगल पांडे की भी प्रतिमा प्रत्यके जिलों में लगाए जाने की बात सपा नेता करते रहे हैं।

    प्रियंका गांधी की निगाहें यूपी पर

    कांग्रेस भी ब्राह्राणों को एकजुट करने की कोशिश में है। प्रियंका गांधी भी यूपी मिशन में जुटी हुई हैं। कांग्रेस के कई नेता कह चुके हैं कि अगर पार्टी सत्ता में आयी तो प्रियंका गांधी मुख्यमंत्री बनेंगी। हालांकि कांग्रेस आधिकारिक तौर पर सीएम पद को लेकर कोई एलान नही की है लेकिन यह बताने में भी नही चूकती कि जब पार्टी की सरकार यूपी में थी कई ब्राह्राण नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया था।

    भाजपा भी ब्राह्राणों को लुभाने में जुटी

    वहीं भाजपा भी ब्राह्राणों को लुभाने की कोशिश कर रही है। केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार में ब्राह्राण नेताओं के साथ समाज के अन्य वर्गों के नेताओं को जगह देकर भाजपा ने बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। यूपी में पार्टी के ब्राह्राण चेहरों को भी जनता के बीच जाकर सरकार की उपलब्धियों को बताने को कहा गया है।

    ओवैसी भी यूपी में दमखम दिखाने को तैयार

    सपा, बसपा और भाजपा के बाद अगर किसी दल की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही तो वह है ऑल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (एआईएमआईएम)। एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी भी यूपी में सक्रिय हैं। उनकी नजर मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों पर है। इसकी मुख्य वजह यह है कि पिछले विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी 13 सीटों पर चौथे नंबर पर रही थी। ओवैसी की पार्टी को चौधरी अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोकदल के बराबर वोट मिले थे। यही वजह है ओवैसी प्रदेश के छोटे-छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। मेरठ, सहारनपुर, आजमगढ़, गाजियाबाद, जौनपुर, अंबेडकरनगर, मऊ, गाजीपुर, संतकबीरनगर, बलिया समेत ऐसे कई अन्य जिले हैं जहां की सीटों पर ओवैसी को संभावना नजर आ रही है। आमतौर पर मुस्लिम वोट बैंक समय-समय पर सपा और बसपा के साथ रहा है। हालांकि सपा के साथ मुस्लिम वोट मजबूत माना जाता है। अगर मुस्लिम वोट बैंक में बंटवारा हुआ तो सपा को नुकसान और भाजपा को फायदा मिल सकता है।

    आम आदमी पार्टी लड़ेगी यूपी विधानसभा चुनाव

    अगले साल फरवरी-मार्च में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव की तैयारी आम आदमी पार्टी (आप) भी कर रही है। दिल्ली की सत्तारूढ़ अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी यूपी में विधानसभा चुनाव पहली बार लड़ेगी। हालांकि 2014 में आप यूपी में लोकसभा चुनाव लड़ चुकी है लेकिन कोई सफलता हाथ नही लगी थी। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल खुद वाराणसी लोकसभा सीट से तब के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं। साल 2017 में आप चुनाव नहीं लड़ी थी लेकिन भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार जरुर किया था।

    दिल्ली मॉडल की तर्ज पर आप यूपी विधानसभा चुनाव लड़ेगी। आप नेता संजय सिंह को केजरीवाल ने चुनाव जीतने के लिए मिशन पर लगाया है। संजय सिंह समय-समय पर यूपी का दौरा करते रहे हैं। पार्टी को मजबूत करने के लिए संजय सिंह पिछले कई सालों से यूपी में काम कर रहे हैं। केजरीवाल फ्री बिजली-पानी के मुद्दे पर चुनाव लड़ने का संकेत दे चुके हैं। इसके अलावा सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने का वादा आप नेता करते रहे हैं। यूपी में आप का संगठन मजबूत नही है ऐसे में केजरीवाल की पार्टी भाजपा, सपा और बसपा जैसी पार्टियों को कितना टक्कर दे पाती है यह तो समय ही बताएगा।

    इस खबर के लेखक टीवी पत्रकार मंगल यादव जी हैं जो समसामयिक मुद्दों पर अपनी राय खुल कर रखते है।

  • आजादी के 75 वर्षों में देश के विकास में बैंकों का योगदान और बदलाव

    आजादी के 75 वर्षों में देश के विकास में बैंकों का योगदान और बदलाव

    देश जब आजादी के 75वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है इस सफर के विकास में देश के बैंकिंग क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कृषि, उद्योग, सड़क, बिजली, टेलिकॉम, शिक्षा, रियल एस्टेट सभी के विकास के लिय बैंकों ने भरपूर सहयोग किया है। 1947 में जहाँ 664 निजी बैंकों की लगभग 5000 शाखाएं थीं वहीँ आज 12 सरकारी बैंकों, 22 निजी क्षेत्र के बैंकों, 11 स्माल फाइनेंस बैंकों, 43 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और 46 विदेशी बैंकों की लगभग 1 लाख 42 हजार शाखाएं हैं।

    भारतीय रिज़र्व बैंक

    भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना 1935 में, RBI अधिनियम 1934 के तहत जॉन हिल्टन यंग कमीशन की सिफारिशों पर की गई थी, जिसे भारतीय मुद्रा और वित्त पर रॉयल कमीशन भी कहा जाता था, जो देश का केंद्रीय बैंक है और 1 जनवरी 1949 को राष्ट्रीयकृत किया गया था। रिजर्व बैंक मुख्य रूप से सरकार के व्यावसायिक लेनदेन को सम्पादित करता है, मुद्रा जारी करता है, बैंकिंग का संचालन तथा प्रबंधन पर नियंत्रण करता है, नये बैंकों के लिय लाइसेंस देता है और बैंकों को समय समय पर जरूरत के अनुसार ऋण उपलब्ध करवाता है।

    स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया

    1806 में कोलकाता में बैंक ऑफ कोलकाता की स्थापना हुई जो बाद में बैंक ऑफ बंगाल के नाम से जाना गया। 1921 में बैंक ऑफ मुंबई और बैंक ऑफ मद्रास का बैंक ऑफ बंगाल में विलय हो गया। जो मिलकर इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया बना। 1 जुलाई 1955 को इम्पीरियल बैंक (Imperial Bank) का नाम बदलकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (State Bank of India) रख दिया गया था। साल 1955 में ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (सब्सिडरी एक्ट) पारित हुआ। अक्टूबर में स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद SBI का पहला सहयोगी बैंक बना। इन सहयोगी बैंकों में स्टेट बैंक ऑफ़ बीकानेर एण्ड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ इंदौर, स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर। नरसिंहम् समिति की सिफारशों पर कार्यवाही करते हुए केन्द्र सरकार ने सबसे पहले 2008 में स्टेट बैंक ऑफ़ सौराष्ट्र, 2010 में स्टेट बैंक ऑफ़ इंदौर और 2017 में बाकी पांच एसोसिएट बैंकों स्टेट बैंक ऑफ़ बीकानेर एण्ड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर का स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया में विलय कर दिया । अपने स्थापना काल में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के कुल 480 ऑफिस थे जबकि आज 24000 से ज्यादा शाखाओं के साथ स्टेट बैंक देश का सबसे बड़ा बैंक है।

    बैंकों का राष्ट्रीयकरण

    19 जुलाई 1969 को देश के 14 प्रमुख बैंकों का पहली बार राष्ट्रीयकरण किया गया था और वर्ष 1980 में पुनः 6 बैंक राष्ट्रीयकृत हुए थे। राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों की शाखाओं में बढ़ोतरी हुई। शहर से उठकर बैंक गांव-देहात की तरफ चल दिए। आंकड़ों के मुताबिक़ जुलाई 1969 को देश में इन बैंकों की सिर्फ 8322 शाखाएं थीं। 2021 के आते आते यह आंकड़ा लगभग 87 हजार का हो गया। देश के विकास में इन राष्ट्रीयकृत बैंकों की अहम भूमिका रही और इन बैंकों ने कृषि, उद्योग, सड़क, बिजली, टेलिकॉम, शिक्षा, रियल एस्टेट सभी के विकास के लिये बैंकों ने भरपूर सहयोग किया है। डी.आर.आई. जेसे छोटे ऋणों से लेकर बड़े बड़े प्रोजेक्ट्स के लिय ऋण की व्यवस्था की।

    बैंकों का कंप्यूटराईज़ेशन

    वर्ष 1980 में बेंकिंग में कंप्यूटर की आवश्यकता महसूस हुई और 1988 में रिजर्व बैंक ने डा. रंगराजन की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया जिसने बैंकों में कंप्यूटर लगाने की सिफारिश की और 1993 में बैंकों में कंप्यूटर लगाने के लिए सहमति बनी और बैंकों में कंप्यूटर लगने शुरू हो गये और समय के साथ साथ उनमे बदलाव होता गया और आज कंप्यूटर के बिना बैंकिंग संभव ही नहीं लगती। हालाँकि कंप्यूटर से बैकिंग तो आसान और 24 घंटे उपलब्ध हो पाई लेकिन इसके कारण बैंकों में रोजगार की संभावनाएं कम हो गईं।

    को-ऑपरेटिव बैंक

    भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सहकारिता का महत्वपूर्ण योगदान है। यही सहकारिता का विकास मुख्य रूप में कृषकों को सस्ती दर से ऋण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से हुआ है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सहकारिता आन्दोलन अधिक तेजी से विभिन्न दिशाओं में फैला । सरकर द्वार नियुक्त ”अखिल भारतीय ग्राम-ऋण समिति – 1954” एवं ”बैकुण्ठलाल मेहता समिति – 1960” के सुझावों ने सहकारिता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
    पिछले कुछ सालों से भारत में बैंकों की वित्तीय हालत काफी गिर गयी है। कई घोटाले सामने आ चुके हैं जैसे पंजाब और महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक, यस बैंक और शिम्भोली सुगर मिल्स बैंक स्कैम इत्यादि।
    इन्हीं घटनाओं को देखते हुए भारत सरकार ने जून 2020 में अध्यादेश पास किया है कि अब देश के सभी सहकारी या को-ऑपरेटिव बैंकों को रिज़र्व बैंक के दायरे में लाया जाए। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा ‘सहकार से समृद्धि’ (सहकारिता के माध्यम से समृद्धि) के दृष्टिकोण को साकार करने और सहकारिता आंदोलन को एक नई दिशा देने के लिये एक अलग ‘सहकारिता मंत्रालय’ बनाया है।
    वर्तमान में देश में 1482 शहरी को-ऑपरेटिव बैंक हैं, जबकि 58 मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक हैं। इन 1540 बैंकों में क़रीब 8.6 करोड़ जमाकर्ताओं के 4 लाख करोड़ 84 लाख रुपए जमा हैं।

    क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक

    2 अक्टूबर 1975 को सरकार ने बैंकिंग सुविधाएँ गांव गांव तक पहुँचाने के लियें क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की स्थापना की। देश भर में आज 43 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक काम कर रहे हैं जिनकी 22000 शाखाएं हैं । ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में इन बैंकों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 1947 से लेकर 1955 तक 360 छोटे-मोटे बैंक डूब गए थे जिनमें लोगों का जमा करोड़ों रूपया डूब गया था। 1969 और 1980 में राष्ट्रीयकरण के बाद भी समय समय पर निजी बैंकों की हालत खराब होने पर सरकार द्वारा इन बैंकों को राष्ट्रीयकृत बैंकों में मिला दिया गया इनमें प्रमुख लक्ष्मी कमर्शियल बैंक, बैंक ऑफ़ पंजाब, हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक, भारत बैंक, नेडूनगड़ी बैंक, न्यू बैंक ऑफ़ इंडिया, ग्लोबल ट्रस्ट बैंक और यूनाइटेड वेस्टर्न बैंक थे। जबकि बैंक ऑफ़ राजस्थान और सांगली बैंक को आई.सी.आई.सी.आई. बैंक में मिला दिया।
    वर्ष 1991 के आर्थिक संकट के उपरान्त बैंकिंग क्षेत्र के सुधार के दृष्टि से जून 1991 में एम. नरसिंहम् की अध्यक्षता में नरसिंहम् समिति अथवा वित्तीय क्षेत्रीय सुधार समिति की स्थापना की गई, इसने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिये व्यापक स्वायत्तता प्रस्तावित की। समिति ने बड़े भारतीय बैंकों के विलय के लिये भी सिफारिश की थी। इसी समिति ने नए निजी बैंकों को खोलने का सुझाव दिया जिसके आधार पर 1993 में सरकार ने इसकी अनुमति प्रदान की।

    न्यू जनरेशन प्राइवेट बैंक

    वर्ष 1994 में नये प्राइवेट बैंकों का युग प्रारम्भ हुआ। आज देश में 8 न्यू प्राइवेट जनरेशन बैंक, 14 ओल्ड जनरेशन प्राइवेट बैंक, 11 स्माल फाइनेंस बैंक काम कर रहे हैं। लेकिन ये सभी निजी बैंक समाज के एक वर्ग विशेष की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं जबकि सरकारी बैंक समाज के सभी वर्गों के लिए काम कर रहे हैं। 2018 में सरकार ने इण्डिया पोस्ट पेमेंट बैंक की स्थापना की जिसका मकसद पोस्ट ऑफिस के नेटवर्क का इस्तेमाल करके बेंकिंग को गाँव गाँव तक पहुंचना था। इसके साथ साथ और कई प्राइवेट पेमेंट बैंकों की भी शुरुआत हुई।

    बैंकों का मर्जर

    वर्ष 2019 में तीन बैंकों, बैंक ऑफ़ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक का विलय तथा 1 अप्रैल 2020 से सिंडीकेट बैंक का केनरा बैंक में, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया को पंजाब नेशनल बैंक में और इलाहाबाद बैंक, कारपोरेशन बैंक और आंध्रा बैंक को इंडियन बैंक में का विलय कर दिया गया। इसके बाद वर्तमान में सरकारी क्षेत्र के 12 बैंक रह गये हैं। इसके अगले चरण में सरकार की कुछ बैंकों को निजीकरण करने की योजना है।

    हालांकि आम जनता के लिये कार, घर या निजी ऋण तथा क्रेडिट कार्ड लेने के लिए निजी बैंकों ने शुरआत की थी लेकिन इन ऋणों को साधारण जनता तक पहुँचाने में सरकारी बैंकों का बहुत बड़ा योगदान हैं। इसी तरह वर्तमान मोदी सरकार की वितीय समावेश के लिए शुरू की गई जनधन योजना को लागू करने में भी प्रमुख रूप से इन सरकारी बैंकों का योगदान रहा है। बैंकों द्वारा 42 करोड़ से ज्यादा खाते खोले गये जिसमें आज लगभग एक लाख चालीस हजार करोड़ रूपये जमा हैं। इसी प्रकार सरकार की विभिन योजनाओं अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, सुकन्या आदि को भी जन जन तक पहुँचाने में बैंकिंग क्षेत्र का बहुत बड़ा योगदान है जिसमें सरकारी बैंकों का प्रमुख योगदान है।

    नोट : यह पोस्ट अश्वनी राणा जी द्वारा लिखी गई है अश्वनी राणा जी (वॉयस ऑफ बैंकिंग) के संस्थापक है।

  • 6 करोड़ नौकरीपेशा के फायदे की खबर, EPFO ने बदले ये खास-खास नियम

    6 करोड़ नौकरीपेशा के फायदे की खबर, EPFO ने बदले ये खास-खास नियम

    Labour ministry ने कोविड-19 महामारी के बीच कर्मचारी भविष्य निधि संगठन ( EPFO) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम ( ESIC) की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के जरिए कर्मचारियों के लिए अतिरिक्त सहूलियतों की घोषणा की है। इनमें Covid 19 से मरने वाले ESIC के बीमा धारकों के आश्रितों के लिए पेंशन की सुविधा और ईपीएफओ द्वारा संचालित समूह बीमा योजना – कर्मचारी जमा सम्बद्ध बीमा योजना (EDLI) के तहत सुनिश्चित 6 लाख रुपये की रकम को बढ़ाकर 7 लाख रुपये करना शामिल है।

    फिलवक्‍त ESIC बीमाधारक की मृत्यु या शारीरिक अशक्तता की स्थिति में उसके पति/पत्नी और विधवा मां को जीवन पर्यंत और बच्चों को 25 साल उम्र तक उस कर्मचारी के औसत दैनिक वेतन के 90 प्रतिशत हिस्से के बराबर पेंशन दी जाती है। कर्मचारी की बेटी होने की स्थिति में उसे उसकी शादी तक यह फायदा मिलता है।

  • चक्रवात Tauktae लाइव अपडेट: गुजरात ने एक लाख लोगों को निकाला

    चक्रवात Tauktae लाइव अपडेट: गुजरात ने एक लाख लोगों को निकाला

    सोमवार तड़के Tauktae की रफ्तार तेज हो गई।

    भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने सोमवार को कहा कि तौकता एक “बेहद गंभीर चक्रवाती तूफान” में बदल गया है।

    आईएमडी ने कहा कि सोमवार की तड़के तेजी से तीव्रता आई, जिसने पहले भविष्यवाणी नहीं की थी कि ताउकटे एक अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफान में बदल जाएगा ।

    अब इसकी हवा की गति 180-190 किलोमीटर प्रति घंटा है और हवाएं 210 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही हैं। हालांकि, आईएमडी ने पूर्वानुमान लगाया है कि गुजरात तट से टकराने पर इसकी तीव्रता कम हो जाएगी।

    यहां नवीनतम अपडेट दिए गए हैं :

    मुंबई

    मुंबई जाने वाली इंडिगो, स्पाइसजेट की तीन उड़ानें डायवर्ट

    एक बयान में कहा गया है कि बजट वाहक इंडिगो और स्पाइसजेट द्वारा संचालित तीन शहर जाने वाली उड़ानों को सोमवार को मुंबई हवाई अड्डे पर दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया गया था, एक बयान में कहा गया है कि तुकते चक्रवात अलर्ट।

    छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे (सीएसएमआईए) ने सोमवार को एक बयान में कहा कि शहर जाने वाली इंडिगो की एक उड़ान को हैदराबाद की ओर मोड़ दिया गया, जबकि स्पाइसजेट की एक उड़ान को सूरत की ओर मोड़ दिया गया।

    इसके अलावा, इंडिगो की एक फ्लाइट को वापस लखनऊ भेजा गया।

    महाराष्ट्र

    महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने की स्थिति की समीक्षा

    महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सोमवार को मुंबई, ठाणे और राज्य के अन्य तटीय जिलों में स्थिति का जायजा लिया।

    एक आधिकारिक बयान के अनुसार, रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और रायगढ़ जिलों के तटीय इलाकों में रहने वाले 12,420 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है।

    इनमें रायगढ़ में 8,380, रत्नागिरी में 3,896 और सिंधुदुर्ग में 144 लोग शामिल हैं।

    बयान में कहा गया है कि श्री ठाकरे ने मुंबई, ठाणे और पड़ोसी क्षेत्रों की स्थिति की समीक्षा की और अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि चक्रवाती तूफान के कारण क्षेत्र में सीओवीआईडी ​​​​-19 रोगियों का इलाज प्रभावित न हो।

    गुजरात

    गुजरात ने एक लाख लोगों को निकाला

    गुजरात प्रशासन ने एहतियात के तौर पर 17 जिलों के तटीय इलाकों में रहने वाले एक लाख से अधिक लोगों को रविवार देर रात तक सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया और सोमवार सुबह काम फिर से शुरू हो गया.

    राज्य आपातकालीन संचालन केंद्र के अनुसार, सोमवार को सुबह 6 बजे समाप्त 24 घंटे की अवधि में, गुजरात के 21 जिलों के 84 तालुकों में हल्की बारिश हुई, जो मुख्य रूप से चक्रवाती विक्षोभ के कारण हुई।

    छह तालुकों में एक इंच से अधिक बारिश हुई।

    INCOIS

    उच्च लहरें, पश्चिमी तट पर राज्यों के लिए वर्षा का पूर्वानुमान

    INCOIS

    तट से 10 किमी तक 3.5 मीटर और 7.8 मीटर के बीच की ऊंची लहरें, 3 मीटर तक की ज्वारीय लहरें और 50 किमी प्रति घंटे और 145 किमी प्रति घंटे के बीच हवा की गति के साथ-साथ वर्षा – हल्की मध्यम से भारी – पश्चिम के राज्यों के लिए पूर्वानुमानित की गई है। इंडियन नेशनल सेंटर फॉर ओशन इंफॉर्मेशन सर्विसेज (आईएनसीओआईएस) द्वारा यहां जारी एक संयुक्त पूर्वानुमान बुलेटिन के अनुसार, बहुत गंभीर चक्रवाती तूफान ताउते (उच्चारण ताउते) के मद्देनजर तट के अगले 24 घंटों में और तेज होने की संभावना है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी)।

    मंगलुरु

    कोरोमंडल समर्थक IX टग के सभी नौ चालक दल को बचाया गया

    कोरोमोंडेल सपोर्टर IX टग पर फंसे सभी नौ क्रू मेंबर्स को सोमवार सुबह एयरलिफ्ट कर सुरक्षित निकाल लिया गया।

    कर्नाटक के तट कमांडर डीआईजी एसबी वेंकटेश ने यह जानकारी जिला प्रभारी मंत्री कोटा श्रीनिवास पुजारी, सांसद नलिन कुमार कतील और डीसी केवी राजेंद्र की एक टीम को दी, जिन्होंने उनसे मुलाकात की और फंसे हुए चालक दल को बचाने के लिए तत्काल कार्रवाई की मांग की।

    श्री वेंकटेश ने टीम को बताया कि उडुपी जिले में कौप तट से लगभग 6 किमी दूर स्थित जहाज से फंसे हुए चालक दल को एयरलिफ्ट करने के लिए नौसेना के हेलीकॉप्टरों को तैनात किया गया था।

    मुंबई

    आज मुंबई में कोई टीकाकरण नहीं

    चक्रवात Tauktae पर चेतावनी के मद्देनजर, बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने अपने टीकाकरण अभियान को सोमवार के लिए स्थगित कर दिया है, इसके बजाय इसे मंगलवार, बुधवार और गुरुवार को स्थगित कर दिया है।

    बीएमसी ने शुक्रवार को घोषणा की थी कि भारत मौसम विज्ञान विभाग की चक्रवात चेतावनी को देखते हुए 15 और 16 मई को कोई टीकाकरण नहीं होगा।

    कोच्चि

    तटरक्षक बल ने कोच्चि से 12 मछुआरों को बचाया

    भारतीय तटरक्षक बल (आईसीजी) ने सोमवार को कहा कि उसने 16 मई की रात आने वाले चक्रवात तौके के कारण उबड़-खाबड़ समुद्र के बीच कोच्चि तट से लगभग 35 समुद्री मील दूर फंसे 12 मछुआरों को बचाया।

    “भारतीय मछली पकड़ने वाली नाव जीसस कोच्चि से 35 समुद्री मील दूर फंसे हुए हैं। आईसीजी जहाज आर्यमन ने 12 चालक दल के साथ नाव को बचाया। आईसीजी जहाज द्वारा नाव को उबड़-खाबड़ समुद्र में ले जाया गया और 16 मई की रात को कोच्चि लाया गया। सभी चालक दल सुरक्षित और स्वस्थ हैं।” आईसीजी ने ट्विटर पर कहा।

    मुंबई

    बांद्रा-वर्ली सी लिंक पर यातायात बंद

    बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि तेज हवाओं को देखते हुए बांद्रा-वर्ली सी-लिंक को यातायात के लिए बंद कर दिया गया और लोगों को वैकल्पिक मार्ग लेने के लिए कहा गया।

    मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (एमएमआरडीए) ने कहा कि एहतियात के तौर पर शहर में मोनोरेल सेवाओं को एक दिन के लिए निलंबित कर दिया गया।

    MMRDA ने कहा कि यह यात्रियों की सुरक्षा के लिए लिया गया एक “त्वरित निर्णय” था।

    मुंबई

    मुंबई एयरपोर्ट सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक बंद

    शहर के छत्रपति शिवाजी महाराज अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे (CSMIA) पर संचालन सोमवार को सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक चक्रवात की चेतावनी के मद्देनजर निलंबित रहेगा, निजी हवाई अड्डे ने अधिसूचित किया है।

    भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने मुंबई के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया है, सोमवार को तेज हवाओं के साथ अलग-अलग स्थानों पर बहुत भारी बारिश की चेतावनी दी है क्योंकि चक्रवात तुकताए के मुंबई तट के करीब से गुजरने की संभावना है।

    CSMIA ने एक अधिसूचना में कहा, “मुंबई हवाई अड्डे पर परिचालन स्थानीय समयानुसार सुबह 11 बजे से स्थानीय समयानुसार दोपहर 2 बजे तक बंद करने की आवश्यकता है।”

    मुंबई

    रात भर हुई बौछारें, मुंबई में तेज हवाएं

    अधिकारियों ने कहा कि मुंबई और उसके आसपास के इलाकों में रात भर तेज हवाएं और बारिश हुई और सोमवार की सुबह “बहुत भीषण चक्रवाती तूफान” तौकता गुजरात की ओर बढ़ रहा था, अधिकारियों ने कहा।

    उन्होंने कहा कि महानगर में कहीं भी जल-जमाव नहीं हुआ, लेकिन कई स्थानों पर पेड़ उखड़ गए, उन्होंने कहा कि अब तक किसी के हताहत होने की खबर नहीं है।

    निकाय अधिकारियों के अनुसार, रविवार से मुंबई में पेड़ गिरने की लगभग 34 घटनाएं हुई हैं, लेकिन किसी के हताहत होने की कोई खबर नहीं है।

    नागरिक-संचालित बृहन्मुंबई इलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट (BEST) उपक्रम ने आपदा प्रबंधन के लिए नियंत्रण कक्ष सहित विभिन्न स्थानों पर अपने परिवहन और बिजली विंग के अधिकारियों को तैनात किया है।

  • ITR फाइल करने के ये हैं 10 फायदे

    ITR फाइल करने के ये हैं 10 फायदे

    1 – नुकसान कैपिटल लॉस की भरपाई :-अगर आप शेयर बाजार में निवेश करते हैं औरउसमें कमजोरी होने के कारण आपकी पूंजी घट जाती है, तो इसे पूंजी हानि कहा जाता है। समय पर आईटीआर भरने का लाभ यह है कि आप भविष्य में इस तरह के लाभ के साथ नुकसान को समायोजित कर सकते हैं ।

    2- बड़े लेन-देन में जरूरी :- यदि आप अधिक पैसे के लिए कोई लेनदेन करते हैं, तो आईटीआर आपके लिए मददगार साबित होता है। समय पर आईटीआर दाखिल करने के कारण, आप संपत्ति खरीदने या बेचने, बैंक में बड़ी राशि जमा करने, म्यूचुअल फंड में निवेश करने के बाद आयकर विभाग से नोटिस प्राप्त करने का जोखिम नहीं उठाते हैं।

    3- बैंक लोन, क्रेडिट कार्ड लेना सुविधाजनक :- अगर आप बैंक से लोन लेना चाहते हैं, तो आईटीआर आपकी आय साबित करने का सबसे अच्छा सबूत है। होम या कार लोन के लिए बैंक ग्राहक से 2-3 साल का आयकर रिटर्न मांगते हैं। यदि आपके पास आईटीआर की एक प्रति है, तो ऋण प्राप्त करना बहुत आसान हो जाता है।

    4- TDS क्लेम के लिए आवश्यक :- अगर आपकी कमाई पर कोई टैक्स घटाया गया है (स्रोत पर टीडीएस यानी टीडीएस) तो इसे वापस लेने के लिए आईटीआर फाइल करना जरूरी है।

    5- वीजा पाने में सुविधा : यदि आप व्यवसाय या नौकरी के सिलसिले में विदेश जाना चाहते हैं, तो आपके लिए आईटीआर आवश्यक है। कई विदेशी दूतावास वीजा आवेदन में पिछले 2 वर्षों के आयकर रिटर्न की मांग करते हैं। यदि आपके पास आईटीआर है, तो दूसरे व्यक्ति की तुलना में वीजा प्राप्त करना आसान है।

    6- कारोबार के लिए लाभदायक:- ITR आपके व्यवसाय को शुरू करने में बहुत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, यदि आप किसी विभाग का अनुबंध प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको आईटीआर दिखाना होगा। सरकारी विभाग के साथ अनुबंध प्राप्त करने के लिए, पिछले पांच वर्षों का आयकर रिटर्न देना होगा।

    7- ज्यादा बीमा कवर मिलेगा :- अगर आप एक करोड़ रुपये का बीमा कवर (टर्म प्लान) लेना चाहते हैं, तो बीमा कंपनियां आपसे आईटीआर मांग सकती हैं। वास्तव में, वे केवल आपकी आय के स्रोत को जानने और इसकी नियमितता की जांच करने के लिए आईटीआर पर निर्भर करते हैं।

    8- पैनल्टी से मुक्ति :- अगर आयकर रिटर्न भरने में देरी होती है, तो आपको 10,000 रुपये तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। सही समय पर ITR फाइल करने से पेनल्टी से बचा जा सकता है, अगर आप सही समय पर आयकर रिटर्न दाखिल करते हैं तो आपको आयकर विभाग से नोटिस लेने का जोखिम भी नहीं है।

    9- पते का सबूत:- आयकर रिटर्न की एक प्रति आपके निवास का प्रमाण है। आप इसे सभी सरकारी कामों में उपयोग कर सकते हैं। यदि आप आधार या पासपोर्ट बनवाना चाहते हैं, तो आप अपने पते के प्रमाण के रूप में आईटीआर का उपयोग कर सकते हैं।

    10- ब्याज से मिल सकती है राहत:- यदि आपको आयकर का भुगतान करना है और समय पर आईटीआर दाखिल नहीं कर सकते हैं, तो आपको देर से रिटर्न दाखिल करने के लिए आयकर के साथ ब्याज भी देना पड़ सकता है। आप पर आयकर अधिनियम की धारा 234 A के तहत भी जुर्माना लगाया जा सकता है। आप समय पर आयकर रिटर्न दाखिल करके जुर्माना या ब्याज से बच सकते हैं।

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